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आपका कहा अनकहा हम कैसे करें ---------------------------------------- आपका कहा अनकहा हम कैसे करें सोचते आप क्या बयाँ हम कैसे करें। कहते हैं सभी कि सियासी कथन है डँस रही जिंदगी जुदा हम कैसे करें। सियासत चढ़ी बनकर दिमागी बुखार धड़कनें बढ़ गई हैं बंद हम कैसे करें। मुश्किल से सीखा है नज़रों को मिलाना अपनी ही नज़र से जफ़ा हम कैसे करें। दिल है तड़पता सिर्फ उलफत ही में नहीं चू रहे अश्क 'अमर' जाया हम कैसे करें।
दह़ान-ए-ज़िस्म जबसे रिसने लगा ---------------------------------------------- दहान-ए-ज़िस्म जबसे रिसने लगा अज़ीब सुकूँ फिर से मिलने लगा। ज़िगर चाक-चाक होता रहा लेकिन शब़-ए-ग़म से बेखौफ गुजरने लगा। ज़र्द पड़ गए ज़िस्म की पासबानी ये रूहे-फ़ना को कब़ा से लपेटने लगा। भटके हैं उम्र भर दिल्ली की सड़कों पे पहचान सदा-ए-ज़रस की करने लगा। न पढ़ा हर्फे-इबारत नसीब की 'अमर' करीब को यूँ करीब से समझने लगा।
उनकी तो है बात अलग ------------------------------ उनकी है हर बात अलग और है आवाज़ अलग बयाँ करें क्या उनका मुखातीबे-अंदाज़ अलग। हक़ जताकर टोकते और पूछते भी हैं वो हरदम बिंदास उनकी दोस्ती रिश्ता-ए-आगाज अलग। बंद कर आँखेँ सुनते ग़ज़ल फ़िर कहते लाजवाब छू गए अशआर हैं सुखनवर के अल्फ़ाज़ अलग। अक्सर जताते वो नामुमकिन नहीं लांघना पहाड़ हार जज़्ब करने वाले भी होते हैं जांबाज अलग। निकालते संगीत सुरीला टूटे हुए साज से 'अमर’ झूमकर गाते ग़ज़ल ज़िदगी के सब राज अलग।
उम्र भर साथ चलते रहे लेकिन ढूँढ नहीं पाया उनको ---------------------------------------------------------------- उम्र भर साथ चलते रहे लेकिन ढूँढ नहीं पाया उनको बसते तो रहे तसव्वुर में मगर देख नहीं पाया उनको। उड़ाते रहे सुकून से रोज वो अरमानों की राख़ खुद ही फड़कते लबों ने बिखेरी खुशबू देख नहीं पाया उनको। सहमे हुए चमन के दिल में बसा चिनगरियों का अंधेरा चुप सिसकते रहे परिन्दे कोई देख नहीं पाया उनको। हाँफती हवाओं में बेजान दरख़्त खड़े बेज़ार रो रहे थे कलियों-संग रूत थी उदास देख नहीं पाया उनको। चैन की नींद नसीब किसको शोर-ए-आतिश में ‘अमर’ चराग़े-लौ में अटक गई साँसें देख नहीं पाया उनको।
रौशन दरो-दीवार थी जगमगाता था जहाँ चाँदी का दीया ------------------------------------------------------------------- रौशन दरो-दीवार थी जगमगाता था जहाँ चाँदी का दीया वख्त की मार पड़ी ऐसी कि न नसीब है मिट्टी का दीया। चौखट व दालान उजियाते रहे वर्षों खून से जलकर चराग़ फूँकते दौलत बेशुमार शान से वो जलाते रहे घी का दीया। एक दौर था कभी मिटती न थी रौनक उस कूचे की कभी गुलाम भी जलाते रहे उनकी इनायत से उधारी का दीया। जमीं बाँट ली सरहदें बनाकर चलता रहा सितम का खेल जाँबाज़ भी जलाते रहे क़त्लो-गारद बदगुमानी का दीया। हालते-मुल्क बदला आबो-हवा बदली बदल गए हुक्मरान नवाबों को जलाते देखा तरसती आँखों से पानी का दीया। हर साल आती दीवाली 'अमर' दिये भी जलते हैं हर बार इस बार जलाओ दिल में इन्सानियत की बाती का दीया। हमे हुए चमन के दिल में बसा चिनगरियों का अंधेरा चुप सिसकते रहे परिन्दे कोई देख नहीं पाया उनको। हाँफती हवाओं में बेजान दरख़्त खड़े बेज़ार रो रहे थे कलियों के संग रूत थी उदास देख नहीं पाया उनको। चैन की नींद नसीब किसको शोर-ए-आतिश में ‘अमर’ लौ-ए-चराग़ में अटक गई स...
जब भी कदम उस ओर बढ़े ----------------------------------- जब भी कदम उस ओर बढ़े कोई बीच डगर क्यों आता है होती है सुबह जब यादों पर फिर से अंधेरा सा छा जाता है। भूलूँ कैसे उस दिन को भी जब भाग मिले तुम मेरे सीने से कैसे मिटाऊँ यादों का घरौंदा हरपल जो फिर भरमाता है। अब शाम हुई तारे भी चमके रजनी चली करने को सिंगार बिजली चमकी तो सुधियों में आकर रूप तेरा लहराता है। चाँद भी रूठा चाँदनी सिसकी और शबनम की बौछार हुई भोर ने जबसे देखा तुमको मन अंदर तक अब पछताता है। कैसे कहें जाकर उनसे कि ऊसर मिट्टी में उगी दूब 'अमर' देखकर बढ़ता प्रेम का बिरुवा दिल अपना अब इतराता है।
पहले से थे करीब जब करीब और आ गए ---------------------------------------------- पहले से थे करीब जब करीब और हो गए नज़दीक से देखा तो हमसे वो दूर हो गए। पास रहते रहे मग़र बनी रहीं दूरियाँ जनाब जख्म़े-ज़िगर देकर वो भी यूँ मश़हूर हो गए। लुत्फ़ ले रहे सब पढ़कर हर्फ़े-दर्दे-दिल मेरा कुरेदा पुराने घाव जो सिरफ़ नासूर हो गए। गूँज़ती रही चुप्पी मुस्कुराते रहे होंठ उनके समां ऐसा के शेर कहने को मजबूर हो गए। मश़गूल सभी खुद में कुछ मश़रूफ भी रहे बदला तो नहीं कुछ बदनाम जरूर हो गए। 'अमर' उस्ताद बन रहे वही जो मुरीद़ थे तेरे बदलती आब़ो-हवा में सबको ग़ुरूर हो गए।
लोग तो हमेशा से धरम के मरम में जीते चले जाते हैं ------------------------------------------------------------ लोग तो हमेशा से धरम के मरम में जीते चले जाते हैं डूबते हुए सूरज को भी वो श्रद्धा से दीया दिखाते हैं। देख लो खोलकर आँखें तुम दीनो-धरम के ठेकेदारो चीखते रहो लेकिन हम ही पूजा का अर्थ जतलाते हैं। कुदरत लुटाती रही नूर सब पर खुदा की कायनात में और इंसान आज आबो-हवाओं का भी दिल दुखाते हैं। कचरा फैलाते नव-दौलतिया पागलपन के इस दौर में सर्द पानी में खड़े लोग सुबह का उजाला ढूंढ लाते हैं। रोज करते जुमलों से विकास हालते-मुल्क की रहनुमा मगर साफ कर गंदगी आम आदमी उम्मीद जगाते हैं। पहनकर नाकभर सेंदूर वो दुआ में उठाते रहे दोनों हाथ जिंदगी तो जश्न है 'अमर' हर पल उमंगों के गीत गाते हैं।
जब भी खिलों फूलों की तरह खुशबू सा समा लेना मुझको ----------------------------------------------------------------------- जब भी खिलो फूलों की तरह खुशबू सा समा लेना मुझको गर बिखरो बन पराग-कण रस-मकरंद बना लेना मुझको। फैलो जब बरगद की तरह छाया बनना तुम पथिक के लिए तन-मन शीतल करने को मंद समीर सा बुला लेना मुझको। दरिया की तरह इठलाओ तुम हर पल गाओ बढ़ते जाओ बीहड़ में जों चट्टान मिले तो बर्फ़ सा पिघला लेना मुझको। झील सी गहरी इन आँखों में जब डूबा जाए युग का यौवन खुद से मिलने की खातिर तुम मुझसे ही चुरा लेना मुझको। ख्वाबों में ही तुम जब खो जाओ और गरम साँसें भी निकले दिल के धड़कन की सरगम का बना राग बसा लेना मुझको। जब भी खुद को ढूँढा मैने हर बार 'अमर' तेरा अख्श दिखा पर कट गई उम्र ना खोज मिटी आँसू सा बहा लेना मुझको।
किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है --------------------------------------------- किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है ना मालूम कहाँ से ऐसी जिया आ रही है। देखता हूँ सब कुछ पर कुछ दीखता नहीं आफताब चढ़ रहा उधर घटा छा रही है। कल कुछ भी नहीं था आज भी कुछ नहीं किसको पता हवा भी सौगात ला रही है। जिस्म मचलता रहा और जिगर जल गया आग को आग अब किस कदर खा रही है। रोने की सूरत में भी हँसने की आदत उसे गम और खुशी के गीत बेफिक्र गा रही है। समा क्या अजब 'अमर' कुछ सूझता नहीं अंधेरे-उजाले की ये रंगत गजब ढा रही है।
शेर कहने की जबसे आदत बन गई ---------------------------- शेर कहने की जबसे आदत बन गई वक्त की हर शै ही इबादत बन गई। लमहा-लमहा जीने का सुरूर आ रहा लमहा-लमहा मरना किस्मत बन गई। पीता हूँ जब भी तो बढ़ जाती है प्यास पीयेे बगैर जिंदगी ही मुसीबत बन गई। तन्हा कोई पीता कोई पीता भरे-बज़्म पीये बिन गुफ्तगू एक हसरत बन गई। अपने-अपने हिस्से का पी रहे हैं सभी कतरा-ए-ग़म पीने की फितरत बन गई। पीने की ख़्वाहिश में बेचैन तुम 'अमर' अश्कों को पी लेने की चाहत बन गई।
जिन्दगी जीने की तुम्हें ललक बढ़ गई है --------------------------------------------------- जिन्दगी जीने की तुम्हें ललक बढ़ गई है फिर से आज पीने की चसक बढ़ गई है। फैली हुई आग फिर भी हर तरफ अँधेरा धुआँ में घर बनाने की सनक बढ़ गई है। हाथों में हाथ डाल बैठते जो साथ-साथ आँखें अब दिखाने लगे चमक बढ़ गई है। नफरतों के घेरे में कैद हुई जिंदगी जबसे खत्म हुई शर्मो-हया व ठसक बढ़ गई है। छूकर आती रही उनको ये महकती हवा बहारो रुक दिलों की कसक बढ़ गई है। पीना ही पड़ेगा 'अमर' जहर भी जों लाएँ तैरती हुई सांसों की भी महक बढ़ गई है ।
मेरी नज़्म ही मेरी आवाज़ है ============================= अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय 09871603621 1. एक-एक कर ढ़हने लगीं ईमारतें ........................................... एक-एक कर ढ़हने लगी ईमारतें सारी रेत पर बनी लगती हैं टूटी हूई इन बस्तियों में अब आदमी नहीं भीड़ ही दिखती है। उम्र भर कोशिश करते रहे हम धरोहरों को बचाए रखने की मगर उजड़ गए गांवों की टीस यहाँ कहां किसी में दिखती है। लबालब पोखर में पेड़ की फुनगी चढ़ कूद जाने की कशिश बंद-साँसों गोता लगा तलहटी छूने की फितरत में दिखती है। जानता हूँ जम्हुरियत की फसल अब ईंवीएम में लहराने लगी धूर्त्तों को मिल गई चैन उनकी बेफ़िक्री की नींद में दिखती है। कैसे मर जाने दूँ जज़्बात और ज़िन्दा रहने का हौसला 'अमर' पांडवों की साधना की परिणति ही तो महाभारत में दिखती है। 2. भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं ..................................................... वो हिन्दू-मुसलमां और मंदिर-मसजिद की सियासत किया करते हैं अक्सर धरम के नाम पर भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं । ये घिसे-पिटे लोग सियासतदां होने का दम भरते कभी नहीं थकते गौर स...