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मार्च, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
ढल रही अब शाम --------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 ढल रही अब शाम तो फ़िर देखता हूँ प्यार को ढह रही दीवार थी रोके नदी की धार को। उठ रहा था जो बवंडर इस समंदर में कभी बन गया है वो भँवर अब देखकर पतवार को जो दिखाती जिंदगी अब देख मत चुपचाप वह ना मिले साहिल कभी तो चूम ले मँझ धार को। हो सके तो आज पढ़ तुम ज़र्द रुख़ के हर्फ़ को सुर्ख़ गालों ने छुपाया दुख के पारा वार को। कशमकश की इस ख़लिश में चाँद गर मिलता मुझे पूछता ये दाग क्यों है क्या कहें संसार को। चाहते हो कैद करना देह की इस गंध को जज्ब कर पहले 'अमर' तुम आँसुओं की धार को
ब़ुत बनाकर ----------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 ब़ुत बनाकर रोज ही तुम तोड़ते हो कर चुके जिसको दफ़न क्यों कोड़ते हो। अब बता दो कौन सी बाक़ी कसक है आज फिर क्यों सर्द साँसें छोड़ते हो। ख़्वाब सबने तो सुहाने ही दिखाए बन गई नासूर यादें फोड़ते हो। एक मन मंदिर बना लो उस जगह तुम बैठकर दिल से जहाँ दिल जोड़ते हो। फिक्र कब तक डर अजाने का करोगे हादसों की सोच क्यों मुँह मोड़ते हो। बेस़बब तो नैन फिर छलके नहीं हैं क्यों 'अमर' ऐसे जिग़र झिँझोड़ते हो।
यादों में तुम जब आते हो ---------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 यादों में तुम जब आते हो कुछ सौगातें भी लाते हो। भूली-बिसरी सुधियाँ छेड़ी घाव हरे सब कर जाते हो। ऐसा तो सौ बार हुआ है बीच डगर क्यों भरमाते हो। नैनों के कोरों से छलके धीरे से जब मुस्काते हो। ढलता यौवन भी लहराता मुझको अब भी ललचाते हो। बीते जीवन के पल कितने अब भी 'अमर' तुम सकुचातो हो।
रोज होते रहे हादसे ------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 रोज होते रहे, हादसे ही मगर वो नहीं आ सके, बन कभी भी खबर। आज मायूस सा, तुम खड़े हो जहाँ गा रहे थे सभी, कल वहीं नाचकर। हादसों बिन कहाँ, कट रहा वक्त भी जानते हम बनी, अब कँटीली डगर। कौन सुनता यहाँ, चीख सच की कभी बन गया आज तो, सच छुपाना हुनर। जानते सब मगर, हम जताते नहीं मौज़ ही बन गई, जिंदगी का भँवर। है बदल सी गई, कुछ फ़िजा वक़्त की अश्क की धार भी, रुक गई जो 'अमर'।
जाना मैंने भी ग़ज़ल का व्याकरण। हिंदी-उर्दू ग़ज़लों के नियमों के तहत ग़ज़ल कैसे कहें? ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ग़ज़ल 5 से 15 अशआर (शेर का बहुवचन) के उस समूह को कहते है जिसका पहला शेर 'मतला' और आख़िरी शेर 'मक़्ता' कहलाता है। प्रत्येक शेर में एक 'क़ाफ़िया' अवश्य होता है। अर्थात 'क़ाफ़िया' के बिना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती है। 'रदीफ़' से ग़ज़ल की खूबसूरती बढ़ती है और ग़ज़ल की गायकी या गनाइयत में भी चार चाँद लग जाते हैं। इस दृष्टि से 'रदीफ़' ग़ज़ल का एक महतवपूर्ण पहलू है, लेकिन बिना 'रदीफ़' के भी ग़ज़लें कहीं जा सकतीं हैं या जातीं हैं। परंतु बिना 'क़ाफ़िया' के ग़ज़ल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ग़ज़ल का प्रत्येक 'शेर' दो 'मिसरों' (पंक्तियों) का होता है। पहली पंक्ति 'मिसरा-ए-उला' कहलाती है और दूसरी पंक्ति को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाता है। शेर के दोनों मिसरे को एक की 'बह्र' (छंद) पर कहा जाता है अर्थात दोनों 'मि...
22 22 22 22 22 22 नज़रें जो फिसलीं हैं -------------------------------- अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 नज़रें जो फिसलीं हैं इनको अब टिकने दो आवाजें ख़ामोशी की मुझको सुनने दो। चुप्पी का दीवानापन पहचाना मैंने चुप्पी में अपनी तुम मुझको अब बसने दो।। गूँथा है जूड़े में उजले वनफूलों को बागों में जूही अब रूठी कुछ कहने दो। पुरइन भी सरखी भी महके इन साँसों में प्रेमी हूँ बात मुझे सबसे यूँ करने दो। पीछे सब कहते पागलपन की हद हूँ मैं आशिक दीवाना हूँ धड़कन में पलने दो। लैला की आँखों में काजल भी लाली भी आँखों को पीकर फिर आज 'अमर' बहने दो।
'निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी समाय'-- प्रिय और अभिन्न मित्र डॉ विक्रम सिंह तथा खुद के रिश्तों पर यह उक्ति एकदम सटीक बैठ रही है, इस संशोधन के साथ कि डॉ विक्रम सिंह मेरे निंदक तो हरगिज नहीं हैं, बल्कि मेरे व्यक्तित्व के कई पहलुओं के घनघोर समर्थक और सहयोगी हैं। यह तो हम सब जानते ही हैं कि डॉ विक्रम सिंह जी एक सुप्रतिष्ठित कथाकार के साथ ही ख्यातिलब्ध विद्वान समीक्षक और समालोचक भी हैं। वे मेरे भी कविताओं और ग़ज़लों के पाठक (अभी किसी गोष्ठी में उन्हें सुनाने का अवसर नहीं मिला इसलिए  श्रोता नहीं कह सकता) हैं। परंतु निजी मित्र होने के वावजूद वे मेरी ग़ज़लों के कुछ प्रमुख कटु आलोचकों में से एक हैं। इस कारण वे मेरे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। हाल-हाल की मेरी एक ग़ज़ल पर उनके द्वारा व्यक्त की गई तीखी प्रतिक्रिया ने मुझे उस ग़ज़ल में कुछ संशोधन करने को विवश / प्रेरित किया। पता नहीं बदले हुए रूप में अब वह ग़ज़ल उन्हें या अन्य आलोचकों को पसंद आती है या नहीं, परंतु कुछ संसोधनों के साथ वही ग़ज़ल फिर पोस्ट कर रहा हूँ। आप सभी दोस्तों से गुजारिश है कि कृपया तव्वजो फरमाएँ: (बहरे मुतदारिक मुसद्द...
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सुप्रभात।नमस्कार। अहो भाग्य। 🙏 🙏 🌹 🌹 बहुत-बहुत धन्यवाद। 1212/22/2/,212/22/2 मफ़ायलुन/फैलुन/ फ़ा/, फ़ायलुन/फैलुन/ फ़ा बदल रहा गर सबकुछ ----------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 बदल रहा गर सब कुछ, तो बदल जाने दो ठहर जरा मदहोशी, भी मगर छाने दो। तड़क-भड़क देखो तो, होश उड़ जाते हैं चहक रही वासंती प्रीति को पाने दो। हमें गई बौरा ये, बेरहम होली भी बचे हुए पल हैं कम, ग़म सभी खाने दो। बने रहे वाइज़ हम, उम्र-भर रोज़े रख बिना पिए मुझको अब, रिन्द कहलाने दो। खबर मुझे कुछ भी ना, वक़्त के जाने की महक रही साँसों से, देह महकाने दो। बज़ा रही ढ़ोलक रुत, झाल-मंजीरे भी सुनो 'अमर' तुम भी अब, नज़्म कुछ गाने दो।
आज ही मैंने इस ग़ज़ल की बह्र के बारे में मित्रों से जानना चाहा था। मैं प्रिय आशीष अनचिन्हार जी के प्रति धन्यवाद ज्ञपित करना चाहता हूँ कि उन्होने यह स्वीकार किया एवं सुझाव दिया कि मौजूदा बह्र पर ग़ज़ल कही जा सकती है। श्री अनचिन्हार ग़ज़लों के शिल्प-विधान के गंभीर अध्येता हैं, अतः उनकी राय को मैं भी गंभीरता से लेता हूँ। मेरे प्रिय मित्र और हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार एवं आलोचक डॉ विक्रम सिंह जी ने जिस तरह से मनोयोग-पूर्वक मेरी ग़ज़लों को पढ़कर उनकी कमियों को बेबाक तरीके से रखा, उससे भी  मुझे अपने कहन की शैली को धारदार बनाने में मदद मिली है। मैं अपने मित्र डॉ विक्रम सिंह का भी शुक्रगुजार हूँ। मेरी इस ग़ज़ल-यात्रा में कतिपय क्षण ऐसे भी आए जब मेरा आत्मविश्वास डगमगाया भी। ऐसे वक़्त मेरे अग्रज गुरूभाई परमादरणीय सुप्रतिष्ठित एवं वरिष्ठ गीतकार और ग़ज़लकार श्री शम्भूनाथ मिस्त्री जी ने जो मेरा मनोबल बढ़ाया और मेरी त्रुटियों को परिमार्जित करके उनमें जो निखार लाया उसके लिए मैं उनका सदा-सर्वदा के लिए कृतज्ञ हूँ। परंतु मेरी इस यात्रा में जिन्होने मुझे अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, मेरी बेबह्र पंक्तियों को सुधारकर...
"बदल रहा सब कुछ तो फ़िर, बदल जाने दो मुझे मगर बेहोशी की, दवा खाने दो।" मात्रिक चंद में 23 मात्राओं का यह मतला यति और गति के नियम का पालन करता है। परंतु इसकी बह्र क्या है? किसी को जानकारी हो तो कृपया बताने का कष्ट करें? मुझे मतले का यह स्वतःस्फूर्त शेर बहुत पसंद आ रहा है। अगर इसकी बह्र कोई बता सके तो आसानी होगी, अन्यथा मुझे इसे बे-बह्र ही कहना पड़ेगा क्योंकि इसके आंतरिक लय को मैं नहीं तोड़ना चाहता।
बहरे-मुतदारिक मसम्मन सालिम: फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन (212 212 212 212 ) ना दिशा ना किनारा ---------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 ना दिशा ना किनारा, बही जिंदगी ना फ़जा ना फ़साना, यही जिंदगी। आबरू की फ़िकर थी, आज भी बहुत इसलिए बेख़बर भी, लही जिंदगी। फिर चली मौसमी है, यहाँ भी हवा दर्द सब सह सके जो, वही जिंदगी। देख पाए नहीँ हम नज़र भर जिन्हेँ बात उनकी सुनी अनकही जिंदगी। बह रही हर बरस बस, पुरानी हवा गंध बासी मग़र हँस, रही जिंदगी। खेल सब जानते हैं, गज़ब ये ‘अमर’ जीतकर हार में जी, रही जिंदगी।
(बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन) फूल ही फूल हैं कब खिले ----------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 फूल ही फूल हैं कब खिले प्यार ही प्यार हैं कब मिले। पूछ लूँ गर कभी वो रुके वक़्त से हैं हमें कुछ गिले। अश्क जो बह गए रात भर भोर तक वे कुमुद बन खिले। रूठकर जो गए प्यार था वगरना बेफ़िकर सब मिले। शुक्र है कुछ हवा तो चली सूखते शाख भी अब हिले। आज तुम मत रहो चुप "अमर" हिल रहे होठ थे जो सिले।