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टुकड़ों में बंटती ही रही ................................. अमर पंकज ( डा अमर नाथ झा) टुकड़ों में बँटती ही रही इस जिन्दगी का क्या करें   हर वक्त मर ती ही रही इस जिंदगी का क्या करें ।   सौदा बना सच का रहे वो बैठकर डेरों में ही अस्मत तो लु टती ही रही इस जिंदगी का क्या करें। इस शोहरत का राज क्या है जाके भी पूछो वहाँ ।  हर पल सिमटती ही रही इस जिंदगी का क्या करें। हैरान थे सब देखकर उस काफिले का रंग ही वह रंग धुलती क्यों नहीं इस जिंदगी का क्या करें। कमतर खुदा से क्यों वो समझें राज का जब साथ था हर हाल डरती ही रही इस जिंदगी का क्या करें।   बरपा रहे थे वो कहर हर रोज बस मासूम पे हर कहर सहती रही इस जिंदगी का क्या करें। उसको फरिश्ता कह रहे थे खून से जो खेलता धज्जी य हां उड़ती रही इस जिंदगी का क्या करें। दो गालियां ये रस्म है सब दिन बिरहमन को यहाँ खमखा ही बजती रही इस जिंदगी का क्या करें। हाकिम ही जों सजदा करे फ़िर मुल्क के हालात क्या हर दिन   ‘ अमर ’ पिटती रही इस जिंदगी का क्या करें। 
देखती ही रही """"""""""""""""""" अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 देखती ही रही राह तेरी सनम तुम मेरे हो हकीकत यही या भरम। मैं तुम्हारे लिए ही तो सजती रही सिर्फ तेरे लिए हो मेरा हर जनम। सूखने सब शजर के लगे शाख हैं पर बचे फूल कुछ जान उनके मरम। ढूँढती आज मैं हर दिशा यार को फल मिलेगा सदा जैसे होंगे करम। सोचना तुम नहीं भींख हूँ माँगती जिद यही प्यार में हम करें क्यों शरम। सिर्फ है इश्क की बात ये अब नहीं आन में मत 'अमर' हो कभी भी नरम।
वक्त का रूप ज्यों-ज्यों बदलता रहा --------------------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 वक़्त का रूप ज्यों-ज्यों बदलता रहा ज़ुल्म का भी नया खुलता रस्ता रहा । आपदाएँ अभी हैं खड़ीं सामने बंद आँखें तू फिर भी तो करता रहा। साज़िशें चल रही थीं पुरानी सभी साज़िशों की इब़ारत़ भी पढता रहा। वो भी शामिल हुए दुश्मनों में अभी यार जिनको तू अपना समझता रहा। इस इमारत में अब धूप आती नहीं रोशनी देखने को तड़पता रहा। रात में देखकर आँसुओं को 'अमर' हर धड़ी करवटें ही बदलता रहा।
प्यार पे ऐतबार कर लेना """"""""""""""""""""""""""""" अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 प्यार पे ऐतबार कर लेना इस तपिस में बहार कर लेना। कर रहे हो सफ़र अगर तन्हा दिल नहीं बेक़रार कर लेना। नाव गर डूबती हो साहिल पे मौज़ से तुम तो प्यार कर लेना। कामयाबी मिले नसीबों से, तुम मुहब्बत शुमार कर लेना। जब उजाला लगे तुम्हें डसने बन्द आँखों को यार कर लेना आग मौसम लगे उगलने तो बस 'अमर' इंतजार कर लेना।
उनकी मिली छाँव तो ----------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 उनकी मिली छाँव तो मशहूर तुम हो गए किसने पुकारा के यूँ मजबूर तुम हो गए किसको बताएँ तड़प दिल की बनी ही रही उनकी हँसी देखकर मगरूर तुम हो गए।। दबकर पड़े थे कहीं पत्थर के जो ढेर में जबसे छुआ उसने कोहेनूर तुम हो गए। मक़सद तुम्हारा गया बन चीरना अब तमस यूँ ही नहीं उस नज़र के नूर तुम हो गए। कुछ तो करम अपने कुछ रब की दुआ भी रही आँधी चली धूल की जब दूर तुम हो गए। इस भीड़ में सब अकेला चल रहा है 'अमर' अच्छा हुआ कारवां से दूर तुम हो गए।
चली थी किधर से किधर जा रही है --------------------------------------------- चली थी किधर से किधर जा रही है न मालूम कैसी जिया आ रही है। नहीं था वहाँ आज भी कुछ नहीं है हवा आज सौगात क्या ला रही है। देखूँ गर कभी कुछ नहीं दीखता है अभी धूप थी अब घटा छा रही है। मचलता रहा जिस्म जलता जिगर है देखो आग अब किस कदर खा रही है। रोती सी वो सूरत पे हँसने की आदत ख़ुशी और ग़म के ग़ज़ल गा रही है। समा क्या अजब कुछ 'अमर' देख तुम भी नई है ये रंगत गजब ढा रही है।
36. (2212 2212 2212 212) ढहने लगी ईमारतें ----------------------------- ढहते गए सारे मकां, जलती फ़सल खलिहान में खोजूँ कहाँ मैं आदमी, बस भीड़ है दालान में। करते रहे हम कोशिशें, उनको बताने की सदा रखते नहीं कुछ फ़ासले, इंसान वो भगवान में। पोखर सभी थे भर चुके, हम रह गए पर फिर वहीं सब लौट आए छू तरल, तल आप के फ़रमान में। रातें कटे ना चैन से, आती नहीं है नींद अब होने लगी बेजान भी, जम्हूरियत मैदान में। बीती कहानी भर नहीं, जज्बा तिरा था मीत वह अपनों भरी दुनिया यही, थी बात कुछ मुस्कान में। कैसे उसे दें छोड़ जो, दे जिंदगी का हौसला उलफ़त “अमर” अहसास है, बसता नहीं शैतान में।
थे हम गए जब उस गली ------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 थे हम गए जब उस गली देखा हवा भी रो रही पाकर मगर फ़िर पास मुझको वादियों में खो रही। मिलकर सभी ने खूब लूटा थी बची केवल तपिस दो बूंद टपके नैन से थी सुध नहीं बस रो रही। हर वक़्त बहती ही रही कब मानती लेकिन हवा दुख-दर्द सब सहते हुए चुपचाप खुद में खो रही। प्यासी हुई नज़रों से देखा छा रही नभ में घटा पर फ़िर अचानक कुछ हुआ शोलों की बारिश हो रही। किस आग में जलती रही वह जो कभी बुझती नहीं किसको पता ये बात के वह पाप सबके ढो रही। चिंता नहीं अपनी उसे वह तो दुखी सबके लिए होके 'अमर' बेचैन वह माँ की तरह ही रो रही।
11212 11212 11212 11212 इस रोग का है इलाज़ क्या """""""""""""""""""""""""""""""""" अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 इस रोग का है इलाज़ क्या मुझे इश्क है जो रक़ीब से कमबख़्त यह मिटता नहीं कोई क्या कहेगा हब़ीब से। कहते रहे सब उम्र भर बदले नहीं तुम ही कभी दहलीज़ पर अब ज़िंदगी वह देखती है क़रीब से। नफ़रत जहाँ तक फैलती घुटता वहाँ तक आदमी खुद को लुटा अब प्यार पर मिलता मगर जो नसीब से। दिल चीर के दिखला रहे हम पास में महबूब है पर सुर्ख खूँ बहता रहा बचते रहे वो गरीब से। सब थक चुके पर वो नहीं उनकी रही मुझ पर नज़र वह चाहते हैं तोड़ना सबको इसी तरक़ीब से। बहने लगी बदली हवा चुभने लगी कुछ आँख को हँसने लगी रुत भी 'अमर' डरने लगे वो सलीब से।
सभी कहते रहे '''"'""""""""""''"""""" अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 सभी कहते रहे उसकी हक़ीक़त का फ़साना अब कहाँ तक वो गिरोगा देखता है ये ज़माना अब। फ़कत वादों के झ़ांसे में सभी खोए रहे सब दिन मग़र फ़िर वक्त भी गाने लगा बदला तराना अब। कली को चूसकर जो गुनगुनाता बेशरम भौंरा पड़ी जब हर तरफ से मार तो ढूँढे बहाना अब। छुपाने की करे कोशिश वही सब दिन गुनाहों को नहीं उसका शरीफ़ों के शहर में है ठिकाना अब। हँसी है हो गई गायब दिखा मायूस अब हाक़िम घिरा जब हर दिशा से वो हँसा दुश्मन पुराना अब। मुकर्रर वक्त हर अंजाम का होता सुनो तुम भी 'अमर' है हो रहा रुस्वा जो बनता था सयाना अब।
लहरों पर बहते जाना ----------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 लहरों पर बहते जाना ही अब भी अच्छा लगता है हिचकोले खाते बढ़ता हूँ तब भी अच्छा लगता है। लम्बी स्याह सी रातें गुजरीं और अभी है भोर हुई देखा थोड़ा निकला सूरज तब भी अच्छा लगता है। सब दिन तुम जिस राह चले हो मंज़िल मेरी आज उधर उठता है तूफ़ान बवंडर जब भी अच्छा लगता है। चलते-चलते थक जाऊँ तो कल की याद दिला देना तेरे मुँह की लाली का मतलब भी अच्छा लगता है। हर पल अपना साथ रहे सो दिखती बस तरक़ीब यही तकती आँखों का तो हर करतब भी अच्छा लगता है। वक़्त बड़ा बलवान 'अमर' है भरता रहता जख़्मों को इज़लास-अदालत से ऊपर रब भी अच्छा लगता है।
क़ुदरत लुभाती जा रही है ---------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 क़ुदरत लुभाती जा रही है फिर मुझे। फ़ितरत रुलाती जा रही है फिर मुझे। लहरें झुलाती जा रहीं हैं फिर मुझे यादें बहाती जा रहीं हैं फिर मुझे। हर दिन मजाज़ी कुफ्र से निस्बत रही अब क्या बनाती जा रही है फिर मुझे । मालिक ने मेरा क्या मुकद्दर लिख दिया हर शै जताती जा रही है फिर मुझे। किस खेल में सिमटी रही ये ज़िन्दगी अब क्या दिखाती जा रही है फिर मुझे। मिटतीं लकीरें हाथ से हैं क्या कभी किस्मत सिखाती जा रही है फिर मुझे। हाकिम 'अमर' खामोश क्यों है इस तरह चुप्पी सताती जा रही है फिर मुझे।
22 22 22 22) हर ठौर नहीं दिल अब मिलता -------------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 हर ठौर नहीं अब दिल मिलता जों फूल नहीं हर पल खिलता। वो दौर बना फिर से सपना तुमसे दिल मिलकर जब खिलता। अपनी दुनिया बदली जबसे कोई भी नहीं तुम सा मिलता। सारी दुनिया भटका लेकिन वो प्यार पुराना नहीं मिलता। कोशिश कर लो तुम भी पर अब यह ज़िस्म नहीं पल भर हिलता। धड़कन चलती तब तक जब तक है जख़्म 'अमर' तुमसे सिलता।
कोई तो बचा लो ----------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 कोई तो बचा लो हैं चाहत के मारे जला है नशेमन अदावत के मारे। कोई हद नहीं अपनी दीवानगी की कहाँ जायें आखिर मुहब्ब़त के मारे। ये आवारगी का फ़साना हमारा सुनाएँ किसे हम हैं उल्फ़त के मारे। सदा दिल की उनके सुनाई पड़ी जब मचलने लगा दिल मुहब्ब़त के मारे। निगाहें तुम्हारी उठीं आज हम पर रहे हम खड़े पर शराफ़त के मारे। 'अमर' आज मंजूर तेरा कहर है डरेंगे नहीं हम मुसीबत के मारे।
पूछ मत बेखबर आज क्यों हैं सभी ------------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 पूछ मत बेखबर आज क्यों हैं सभी राग मायूस चुप साज क्यों हैं सभी। तुम जवाँ पर जुबाँ कैसे खामोश है टूटते हुए अल्फ़ाज क्यों हैं सभी। हर तरफ़ चल रहीं तेज हैं आंधियाँ फ़िर भी हैरान-नाराज क्यों हैं सभी। इश्क़ बेचैन होने लगा हर जगह पर उजागर तेरे राज क्यों हैं सभी। ऐ मुलाज़िम यहीं कैद है जिंदगी इस कफ़स पे करे नाज क्यों हैं सभी। लाएगा रंग तेरा जुनूँ भी 'अमर' अब ज़माने के मुँहताज क्यों हैं सभी।