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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

फिर घिरी है शाम वैसी (ग़ज़ल)

फिर घिरी है शाम वैसी और डेरा फिर वही रोशनी के बीच भी फैला अँधेरा फिर वही शोर ये शमशान में है चल रही है लाश, पर दफ़्न हूँ मैं कब्र में मेरा बसेरा फिर वही रात अँधियारी बहुत है सब्र कब तक हम करें दिल हुआ बेचैन क्या होगा सवेरा फिर वही धुन पुरानी ही बजेगी खेल होगा साँप का साँप है बाजू में उसके है सँपेरा फिर वही नाचतीं अटखेलियाँ करतीं हैं जब भी मछलियाँ जाल में उनको फँसाता तब मछेरा फिर वही हट गया है चीन अब इस बात का चर्चा बहुत पर दिखाया सैटलाइट ने है घेरा फिर वही धान, गेहूँ, साग-सब्ज़ी मुल्क़ में भरपूर है पर 'अमर' क्यों हाल अब भी तेरा मेरा फिर वही

मैं भी हो आया बुक फेयर (कविता)

मैं भी हो आया बुक-फेयर --------------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा ) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 कई सालों बाद इस साल मैं भी हो आया बुक-फेयर मेट्रो से उतरकर मेट्रो स्टेशन में ही टिकट लेने का चला चक्कर टिकट लेकर काफी धूमकर भूल-भूलैया से रास्ते तेढ़ी-मेढ़ी उबड़-खाबड़ थी वह डगर कम से कम एक किलोमीटर पैदल चलकर पहुँच गया मैं बुक-फेयर लेकर घर आ गया बहुत सारी किताबें खरीदकर। मैं भी हो आया बुक फेयर। रास्ते में मूँगफली बेचने वाले पावभाजी सैंडविच पापड़ आलू के पराठे खिलाने वाले और न जाने क्या-क्या दिखाने वाले विक्षुब्ध विश्वामित्र द्वारा बनाई गई अजूबी दुनिया के अजूबे वासिंदे की तरह आज भी एक अलग दुनिया में त्रिशंकु बने हुए मजबूर होकर टंगे हुए कई लोगों का लगा हुआ था बुक फेयर के बाहर एक और फेयर मैं भी हो आया बुक फेयर। बाहर के इस फेयर में मिल रहीं थी किताबें भी मंहगी-मंहगी किताबें सस्ते में मिल रहीं थी बेचने वाले भी सस्ते लग रहे थे कपड़े मैले जो पहन रखे...

सफ़र अभी बाकी है (कविता)

सफ़र बाकी है अभी ---------------------- अमर पंकज (डा अमरनाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय सफर बाकी है अभी अभी बाकी है जिंदगी से अभिसार कह रहा हूं तुम्हीं से बार-बार सुन रही हो न ऐ मृत्यु के आगार। अभी तो अक्षुण्ण है जीवन-ऊष्मा का अनंत पारावार। सुनो तुम जीवन की चुनौती भरी ललकार हमेशा भारी पड़ेगा तुम्हारे क्रूर-दानवी अट्टहास पर हमारा मधुरिम-संसार। साक्षी का कत्थक-नृत्य सोनू का छाया-चित्र मेरी कविता की तान और प्रिय की मुस्कान नित दे रहे हमें अक्षत-जीवन का शाश्वत वरदान। मेरे गाँव को तो देखा है तुमने वहाँ देखा होगा हर पल जीवन के स्पन्दन को तुम्हारे क्रूर-प्रहार निरन्तर सहकर भी बेसुध हो नर्तन करता 'चिरहास-अश्रुमय' मधुमय जीवन का संसार। नीमगाछ-छाँव तले निश्चिन्त लेटकर बतियाते बेसिर-पैर की बातें करते गाँव से लेकर अमेरिका की राजनीति की नब्ज टटोलते ब्राह्मणत्व के दर्प से गर्वित स्वयं को दुनिया का सबसे बुद्धिमान विचारवान-संस्कारवान चरित्रवान प्राणी जतलाते दुर्लभ स्वाभिमान की थाती फोकट में संजोते एक ही धोती सुखाते-पहनते जनेऊ छूक...

पितृ-मिलन (कविता)

पितृ-मिलन -------------- बाबू दा तुम्हारे निमित्त धर्म-शास्त्र सम्मत समस्त कर्मकांड गाँव में ही पूर्ण कर अब सब दुमका आ गये। दुमका आकर खूब खोजा तुम्हें भाभी के साथ मिलकर उस मसनद को टटोला जिसे पीठ के पीछे टिकाया था तुमने आखिरी वक़्त कि शायद तुम्हारा नया पता-ठिकाना मिल जाए! बहुत देर तक खोजा बल्कि खोजता ही रहा ठीक उसी तरह जैसे पिछले चौबीस वर्षों से खोज रहा हूँ छत पर चढ़ने के लिये बनी सीढ़ियों पर माँ को। देर तक बैठा रहा मैं तुम्हारी कुर्सी पर जिस पर बैठे बैठे तुम अपने पौत्र 'स्नेह' के साथ खेलते रहते थे 'एसी' नहीं चलाने पर 'स्नेह' झगड़ता था तुमसे और हार कर तुम चला देते थे 'एसी' हार कर भी जीत जाते थे तुम। लेकिन 'स्नेह' ने झगड़ा नहीं किया मुझसे शायद वह जानता है कि तुम्हारी कुर्सी पर बैठने से ही कोई तुम सा नहीं हो जाएगा तुम्हारा रिक्त स्थान कभी भरा नहीं जाएगा। बाबू दा तुम चले गये कहाँ चले गये? जाना नहीं था जाना चाहते भी नहीं थे फिर भी तुम चले गये? जाना पड़ा तुमको काल के प्रवाह में ठीक उसी तरह जिस ...

जी के या मर के (ग़ज़ल)

जी के या मर के मगर पैदा कर अब बगावत का जिगर पैदा कर क्रांति की आग तो फैलेगी ही इसके पहले तू शरर पैदा कर गुम अँधेरों में न हो जाएँ हम आस की कोई सहर पैदा कर बंद आँखों से भी दिख जाऊँगा प्यार की कोई नज़र पैदा कर इश्क़ को मुश्क ही बनना लेकिन आशिकी का तो हुनर पैदा कर बात दिल में ही उतर जाएं बस ऐसे जज़्बात 'अमर' पैदा कर

बहकने की भी सीमा है (ग़ज़ल)

बहकने की भी सीमा है, भटकना छोड़ दे प्यारे ठहर, आ पास अपनों के मिलेंगे सुख सभी न्यारे अमल करता नहीं कोई बड़े-बूढ़ों की बातों पर नयी दुनिया की उलझन में घिरे अब जा रहे सारे सियासत की हिरासत में यहाँ तकदीर है जकड़ी विवश होकर सभी उनकी लगाते मुफ़्त जयकारे जरा धीरज रखो तुम भी समय पर सुब़्ह भी होगी अँधेरी रात से देखो लड़े जाते सभी तारे 'अमर' मजबूर लोगों पर तरस आता रहा हमको सुनें तो अम्न की बातें लुटें पर रोज बेचारे

कोई नहीं मंज़िल मेरी (ग़ज़ल)

कोई नहीं मंज़िल मेरी फिर क्यों चला मैं जा रहा मैं जा रहा हूँ किस दिशा मुझको नहीं कुछ है पता कैसे नहीं होता परेशाँ क्यों न मैं होता दुखी अंधा बना कानून जब पापी को है लेता बचा अपराध करके छूटते हैं रोज अपराधी यहाँ दे सच बता कानून देता पाप की तू क्या सजा जाती जहाँ तक भी नज़र फैला हुआ है बस धुआँ हर सिम्त फैला ज़ह्र है मैं ज़ह्र लूँ कैसे पचा अवतार अब लेते नहीं भगवान भारत देश में उत्पात करते दानवों को कौन रोकेगा भला अब दिल धड़कना बंद है, अब व्यर्थ सांसे चल रहीं अस्मत लुटी मेरी मग़र कुछ भी नहीं मैं कर सका कितना विवश था मैं 'अमर' बस चीख ही सुनता रहा कुछ भी नहीं मैं कर सका तो क्यों जियूँ कोई बता

क्या कहें किसको कहें (ग़ज़ल)

क्या कहें किसको कहें सौगात दी जो ज़िंदगी ने दानवी इस दौर में चुप कर दिया है बेबसी ने एक ही अपराध मेरा, सच को सच कहता रहा मैं कौन देता साथ सच का, मुझसे दूरी की सभी ने क्रांति थी आराधना, मैं था मनुजता का पुजारी भेद की दीवार तोड़ी, साल के हर दिन महीने जाति-मज़हब कुछ नहीं बस प्रेम था जीवन हमारा पर उजाड़ा प्रेम का संसार नफ़रत की नदी ने ॠषि विरासत धमनियों में भूल बैठा क्यों 'अमर' तू त्याग तेरा देख रक्खा युग युगों से हर सदी ने

सपने मत रंगीन दिखा (ग़ज़ल)

सपने मत रंगीन दिखा बस दिल में बसा तू अपनों को मत दे जाने दूर उन्हें ले पास बुला तू अपनों को अफ़सानों की बात न पूछो, कड़वे सच हैं जीवन के मुश्किल तो है, पर अपना ले दर्द भुला तू अपनों को माज़ी को कर याद नहीं जो बीत गयी सो बात गयी बीते कल की ख़ातिर मत अब यार सता तू अपनों को नर पशुओं की भूख बढ़ी, रक्त पिपासु बने आज सभी हर पल फैले सुरसा का मुँह, आज बचा तू अपनों को जीवन तो इक दरिया है बहते रहना इसकी फ़ितरत सुख-दुख हैं दो छोर 'अमर' निज साथ बहा तू अपनों को

रात भर मंजूर जालना (ग़ज़ल)

रात भर मंज़ूर जलना, जोत ने जतला दिया दूर करके हर अँधेरा दीप ने दिखला दिया घिर गया था हर तरफ़ से, रात काली थी बहुत बिजलियों ने कौंधकर इक रास्ता बतला दिया आग की बहती नदी को पार करना था कठिन पार कर हमने उसे भी आपको दिखला दिया बेअसर थी चीख मेरी कोई भी आया नहीं ज़िंदगी ने चुप्पियों का तब हुनर सिखला दिया बिन किए कोई ख़ता हर पल सज़ा मुझको मिली आँसुओं ने इसलिये चुपचाप फिर नहला दिया बेबसी का था कफ़स थीं धर्म की भी बेड़ियाँ इसलिये तूने हँसी में सच 'अमर' झुठला दिया

चल रहे सब साथ हैं पर हाथ सबके आइना (ग़ज़ल)

चल रहे सब साथ हैं पर हाथ सबके आइना कैसे छिप सकता है कुछ गर हाथ सबके आइना है किसे परवाह कितने दाग दामन पर पड़े भूल जाते लोग अक्सर हाथ सबके आइना है गज़ब की होड़ ये सब रख रहे सबकी ख़बर एक दूजे पे हैं निर्भर हाथ सबके आइना क़त्ल मेरा करके तुम कहते रहे हो ख़ुदकुशी खामखा इल्ज़ाम मुझ पर हाथ सबके आइना मत करो चालाकियाँ अब हैं सयाने सब 'अमर' अक़्स तेरा दिख रहा हर हाथ सबके आइना

दिया था जिसे हमने हर पल सहारा (ग़ज़ल)

दिया था जिसे हमने हर पल सहारा जड़ा मुँह पे थप्पड़ उसी ने करारा बहुत शोर बदलाव का मुल्क़ में है सड़क पर कटोरा लिये है बिचारा मिलेगा नहीं कुछ बहाने से आँसू मिटेगा नहीं दर्द ऐसे तुम्हारा बहारें फ़िजा की लगीं रूठने हैं धुएँ में सिमटने लगा है नज़ारा बिरहमन चुकाता है सच की ही कीमत बिरहमन हैं ईमान सच है हमारा लुटा क्या तुम्हारा भुलाओ 'अमर' तुम बसाना है उजड़ा चमन फिर दुबारा

दूरियाँ घटाने लगीं (ग़ज़ल)

दूरियाँ घटने लगीं हैं साज़िशें बढ़ने लगीं हैं पाँव में जंजीर है तो बंदिशें हटने लगीं हैं आसमाँ खुश हो गया जब बदलियाँ छँटने लगीं हैं बोलना होगा मुझे ही चुप्पियाँ कहने लगीं हैं कह दिया जो मैंने सच तो त्योरियां चढ़ने लगीं हैं आ रहा क़ातिल इधर ही तालियाँ बजने लगीं हैं क़त्ल की तैयारियों में बिज़लियाँ गिरने लगीं हैं फिर 'अमर' बातें तेरी अब सुर्खियाँ बनने लगीं हैं