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फ़रवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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आदरणीय श्री गंगेश गुंजन जी की वाल पर एक बहस खड़ी करने में यत्किंचित योगदान मेरा भी रहा है। इसलिए अभी जो लंबी प्रतिक्रिया मैंने वहाँ पोस्ट की है उसे ही यहाँ भी पोस्ट कर रहा हूँ। टंकण की कुछ अशुद्धियाँ रह गई होंगीं, जिन्हें कभी समय निकालकर ठीक कर लूँगा। परंतु, अभी इसे पोस्ट करने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा हूँ: Amar Pankaj Jha बहुत ही रुचिकर बहस है। इसे आगे बढ़ाना चाहिए। परंतु व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठकर। मैं मैथिल होने का अपना दावा नहीं छोड़ूँगा क्योंकि लगभग 1000 वर्ष पूर्व मिथिला से पूर्वजों द्वारा देवघर प्रयाण के बाद भी आज तक हम अपनी पहचान मैथिल के रूप में ही करते आ रहे है। हाँ, ये बात दीगर है कि यहाँ आकर स्थानीय परम्पराओं से हमने बहुत कुछ ग्रहण भी किया और स्थानीयता को मिथिला से आयातित कई परम्पराओं से सींचकर समृद्ध भी किया। इसे 2017 में प्रकाशित मेरी पुस्तक " रीलीजन एंड मैकिंग ऑफ अ रीजन (अ स्टडी ऑफ संताल परगनाज)" में सविस्तार वर्णित किया गया है। इस तथ्य को बताने का एकमात्र कारण यही है कि मैं भी मैथिल की हैसियत से ही इस बहस में हिस्सा ले रहा हूँ, हालांकि मैथिली गजल...
पिछले कुछ महीनों से कोस रहा था खुद को कि सारा फेसबुक क्रांति करने में लगा हुआ है और मैं कविताओं या ग़ज़लों से क्रान्ति ला रहा हूँ ! आज सोचा चलो एक बार हुलक लेते हैं क्योंकि, अबतक तो फुल पावर से क्रांति आ चुकी होगी। अरे बाबा, देश तो एकदम्मे से बदल चुका है। जिसे देखो वही देश बदलने में लगा हुआ है। अधिकांश क्रांतिकारी भगवा लपेटकर और हुज़ूर को माई-बाप मानकर, तो कुछ भगवा को कोसकर ही सही, सब्भे अमेरिका को पछाड़ने में लगे हुए हैं, क्योंकि, हुजूर के आने के बाद अब चीन की तो कोई औकात ही नह ...
शिवोहम् शिवोहम् । हर-हर महादेव।शिव-शक्ति के मिलन का मुहुर्त।शक्ति में शिवत्व का और शिव में शक्ति के अधिष्ठान का मुहुर्त।संयोग कि विगत दो दशकों से अपने यहाँ भी धूम मचाए हुए 'वैलेंटाइन्स डे' भी इस साल आज ही के दिन है।प्रेम, मांसल प्रेम, का प्रतीक बन चुके इस 'दिवस' का इस बार आज के दिन आना, इसे 'प्रेम-दिवस' कहलाने का हकदार भी बना रहा है। प्रेम के पंथ से गुजरते हुए; देह की गली से चलकर आत्मा तक की यात्रा संपन्न करते हुए, भी कोई 'शिवोहम्' की अनुभूति के धरातल पर पहुँच सकता है। हाँ, प्रेम की उत्कटता, दीवानगी या बावलापन इसकी पूर्व शर्त है।'कुमारसंभवम्' बहुत प्रासंगिक है, आज भी।'सहजिया संप्रदाय' में भी इस उत्कटता को ही शिवत्व (मोक्ष) की प्राप्ति का मार्ग माना गया था।
(बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन) फूल ही फूल हैं कब खिले ----------------------------- अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 फूल ही फूल हैं कब खिले प्यार ही प्यार हैं कब मिले। पूछ लूँ गर कभी वो रुके वक़्त से हैं हमें कुछ गिले। अश्क जो बह गए रात भर भोर तक वे कुमुद बन खिले। रूठकर जो गए प्यार था वगरना बेफ़िकर सब मिले। शुक्र है कुछ हवा तो चली सूखते शाख भी अब हिले। आज तुम मत रहो चुप "अमर" हिल रहे होठ थे जो सिले।
मुशायरा-ए-ग़ज़ल "बे-बह्र" ------------------------------- ग़ज़ल विधा में बह्र को साधना कठिन है।आजकल कोशिश कर रहा हूँ और बा-बह्र ग़ज़लें कह भी रहा हूँ। लेकिन एक बात तो तय है कि बह्र में ग़ज़ल की लय और गेयात्कमता में निखार ही आता है।इसलिए बह्र से समस्या नहीं है। समस्या इस बात से है कि जब भावनाओं का ज्वार फूटता है तो स्वतःस्फूर्त होकर लय और गति का निर्वहन करते हुए जो बोल निकलते हैं, अगर वे बे-बह्र हैं तो उसे ग़ज़ल कहा जाए या नहीं? मुझे तो लगता है कि वे भी मुकम्मल ग़ज़ल ही हैं ।अगर उ स्ताद उन्हें ग़ज़ल नहीं मानते ते हमें नवीन नामकरण ढूँढने चाहिए। फिलहाल तो मैं उन्हें "ग़ज़ल-बेबह्र" कहना पसंद करता हूँ। आदरणीय डॉ गंगेश गुंजन जी, वरिष्ठ और अग्रज ग़ज़लकार "आज़ाद-ग़ज़ल" कहना पसंद करते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार और विद्वान-कवि डॉ अमरेन्द्र भी इस तरह के प्रयोग से सहमति जता रहे हैं ।नामकरण के बारे में विनम्रता से एक बार फिर कुछ कहना चाहता हूँ। वेसे तो "आज़ाद -ग़ज़ल" ज्यादा सुंदर प्रतीत होता है, परंतु "आज़ाद-काफ़िया" की तर्ज पर इसे ग़ज़ल का दोष माना जाएगा। इसके उलट ...
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स्ताद उन्हें ग़ज़ल नहीं मानते ते हमें नवीन नामकरण ढूँढने चाहिए। फिलहाल तो मैं उन्हें "ग़ज़ल-बेबह्र" कहना पसंद करता हूँ। आदरणीय डॉ गंगेश गुंजन जी, वरिष्ठ और अग्रज ग़ज़लकार "आज़ाद-ग़ज़ल" कहना पसंद करते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार और विद्वान-कवि डॉ अमरेन्द्र भी इस तरह के प्रयोग से सहमति जता रहे हैं ।नामकरण के बारे में विनम्रता से एक बार फिर कुछ कहना चाहता हूँ। वेसे तो "आज़ाद -ग़ज़ल" ज्यादा सुंदर प्रतीत होता है, परंतु "आज़ाद-काफ़िया" की तर्ज पर इसे ग़ज़ल का दोष माना जाएगा। इसके उलट "छंद-मुक्त कविता" की तरह ही "बे-बह्र ग़ज़ल" एक आंदोलन की प्रतीति करा सकता है।इसमें मत़ला-मक़्ता, रदीफ-काफ़िया और शेर-मिसरे के नियमों का यथावत पालन किया जा सकता है, सिर्फ छूट ली जा सकती है बह्र में।कितनी भी मात्राओं के मात्रिक छंद में, गति-यति के नियमों का निर्वाह करते हुए अगर हम ग़ज़ल कहें तो वह भी कर्णप्रिय होगा, ऐसा हम कह सकते हैं।ग़ज़ल की सबसे बड़ी विशेषता तो उसकी मधुरता और नफ़ासत ही होती है, जिनका निर्वाह , मात्रिक छंद में बे-बह्र होकर भी किया जा सकता है। वैसे ...