मुस्कुराने का सबब (ज़िंदगी की तलाश) आहऔर सिसकियाँ (सौगात-ए ज़िंदगी) "तू वफ़ा कर न कर ज़िंदगी, जी रहा मैं मगर ज़िंदगी।"
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माना की हम इतिहास के सर्वाधिक खौफनाक दौर के गवाह बन रहे हैं, लेकिन वाबजूद इनके हमारे आस-पास बहुत कुछ ऐसा घटित होता रहता हैं जिनमें जिंदगी करवटें बदलती हैं। जीवन-शून्य नहीं हो गए हैं हम। हमें नित-स्पंदित हो रही जिंदगी की ही तो तलाश रही है!
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