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ग़ज़ल

ग़ज़लः डॉ अमर पंकज दिल्ली विश्वविद्यालय हर ओर हमें अब नफ़रत के हथियार दिखाई देते हैं, इन हथियारों का सब करते व्यापार दिखाई देते हैं। बात नहीं हम केवल करते तकरार दिखाई देते हैं, आज महाभारत के फिर से आसार दिखाई देते हैं। नाम अदब का लेकर सिर्फ़ दुकान चलाते रहते हैं जो, मुझको तो वे पाखंडी और मक्कार दिखाई देते हैं। चीखपुकार मचाते रहते एंकर टेलीवीजन पर जो, उनसे अच्छे खलनायक के किरदार दिखाई देते हैं। हिन्दू मुस्लिम बाभन बनिये और दलित ओबीसी बनकर, इक-दूजे पर सब लहराते तलवार दिखाई देते हैं। जाति-कवच धारण करके कुछ लोग विदेशी कहते हैं जब, तब हम अपनी ही धरती पर लाचार दिखाई देते हैं। लोग 'अमर' अपने हैं लेकिन फिर भी क्यों बेगाने लगते, अपनों से दूरी के लक्षण हर बार दिखाई देते हैं। ©डॉ अमर पंकज, 28-12-22

खैराबेमू : रंगकर्मी आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ का समानान्तर नाट्य-आन्दोलन

“खैराबेमू” : रंगकर्मी आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ का समानान्तर नाट्य-आन्दोलन  “खैराबेमू” : रंगकर्मी आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ का समानान्तर नाट्य-आन्दोलन — डॉ अमर पंकज  सारांश: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ का जन्म 30 जून 1919 को तत्कालीन बिहार के संताल परगना जिला स्थित खैरबनी गांव में और निधन 17 सितम्बर 1977 को अपने पैतृक गांव खैरबनी में ही हुआ था। मात्र 58 वर्ष की आयु पाने वाले ‘पंकज’ जी न केवल एक लोकप्रिय शिक्षक, विलक्षण कवि, गंभीर एकांकीकार, प्रखर समालोचक, सम्मानित साहित्यकार और उद्भट विद्वान थे, बल्कि एक प्रसिद्ध रंगकर्मी भी थे। वे 1955 में स्थापित “पंकज-गोष्ठी” नामक संस्था, जो एक महान ऐतिहासिक काव्यान्दोलन था, के प्रेरक और प्रणेता के साथ-साथ 1961 में स्थापित “खैराबेमू” नामक ग्रामीण नाट्य संस्था के भी प्रेरक और संस्थापक थे। विगत दशकों में यद्यपि कि आचार्य ‘पंकज’ के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करते हुए विद्वानों और अध्येताओं द्वारा काफ़ी कुछ लिखा गया है, तथापि उनके रंगकर्मी व्यक्तित्व पर लगता है अभी तक किसी का समुचित ध्यान नही...
आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ के साहित्य में उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय स्त्री का चित्रण डॉ अदिति गोविल स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय  दिल्ली विश्वविद्यालय सामान्यतः हिन्दी भाषा के क्षेत्रीय कवियों को साहित्यिक संस्कृति के विद्वानों द्वारा अधिक महत्व नहीं दिया जाता। परंतु जैसा कि कहा गया है, किसी भी समय की समाज की गहराई से समझ, उस समाज की मूल भाषा के साहित्य के अध्ययन के बिना संभव नहीं है। यह शोध पत्र संताल परगना के एक क्षेत्रीय परंतु बड़े और महत्वपूर्ण हिन्दी कवि, आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' (1919–1977) की कविताओं में प्रतिफलित स्त्रीवादी विचारों का विश्लेषण विशेष रूप से "स्नेह-दीप"(1958), "उद्गार"(1962) और "अर्पणा"(1961) जैसे काव्य-संग्रहों को आधार बनाकर करने का प्रयास करता है। अतः यह शोध आलेख उनके साहित्य में उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय स्त्री विमर्श को रेखांकित और मूल्यांकन करने का प्रयास करता है, जिसमें उनकी पृष्ठभूमि, स्वाधीनता आंदोलन से प्रेरणा, गांधीवादी दर्शन, और शैक्षिक योगदान को आधार बनाया गया है। इसके साथ ही, स्त्री विमर्श के ऐतिहा...

नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज' की कविताओं का गहन अध्ययन

नये भारत की परिकल्पना: आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ की कविताओं का गहन अध्ययन प्रभाकर पालाका (मूल अंग्रेजी से अनूदित) साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि यह समाज की छवि को दर्शाता है। साहित्य, इतिहास और समाज को आकार भी देता है। यदि आप 20वीं सदी के आरंभ में रचे गए भारतीय-साहित्य का सर्वेक्षण करें तो पाएंगे कि इस काल-खंड के साहित्य लेखन का पूरा संसार स्वतंत्रता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमता रहा था, चाहे वह देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा जा रहा क्षेत्रीय साहित्य हो या फिर भारत में किया जा रहा भारतीय-अंग्रेजी लेखन- जैसे कि राजा राव का कांतापुरा या फिर आर.के. नारायण का महात्मा की प्रतीक्षा (वेटिंग फॉर द महात्मा) नामक उपन्यास। इन सब में ‘गांधी’ द्वारा दिये गए स्वतंत्रता-संग्राम के आवाहन का भाव भरा पड़ा है। उस समय का लेखन धार्मिक एकता बनाए रखने की भावना को प्रतिध्वनित करता है या फिर हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे कि पूर्व-अछूतों तक पहुंचने की कोशिश करता है। यद्यपि 1947 के बाद के लेखन में एक आमूल-चूल बदलाव होना ही था। यही कारण है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत का लेखन संविधान के मूल सिद्...

ग़ज़ल

छुपा राज़ जब बेलबादा हुआ है, हुनर का खुलासा ज़ियादा हुआ है। लुटाया है जब मैनें जो कुछ था मेरा, मेरे दाम में इस्तिफ़ादा हुआ है। मिटी याद सारी पुरानी मैं खुश हूँ, सफ़ा डायरी का भी सादा हुआ है। भटकता रहा जब यहाँ से वहाँ तक, तो जाना तेरा दिल कुशादा हुआ है। बचा खोने को है 'अमर' कुछ नहीं जब, तो मज़बूत मेरा इरादा हुआ है।

ग़ज़ल

ख़ौफ में है शह्र सारा बेबसी फैली हुई है, हम घरों में बंद हैं तो हर सड़क सूनी हुई है। वक़्त बदला लोग बदले पर नही तक़दीर बदली, दिन भयानक हो गए हैं रात हर सहमी हुई है। भाग्य ने है छल किया क्या क्या किया मैं क्या बताऊँ, लाश बनकर जी रहा हूँ ज़िंदगी ठहरी हुई है। साथ सच का ही दिया सच को जिया है उम्र भर पर, चुप हुआ मैं आज सबकी चेतना सोई हुई है। ख़ून मैंने कर दिया है आज अपनी आत्मा का, मूँद लो आँखे 'अमर' अब हर फ़ज़ा बदली हुई है।

ग़ज़ल

गजल: अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल--987160362 कड़ा पहरा है मुझपर तो सँभलकर देखता हूँ मैं, बदन की क़ैद से बाहर निकलकर देखता हूँ मैं। कभी गिरना कभी उठना यही है दास्ताँ मेरी, बचा क्या पास है मेरे ये चलकर देखता हूँ मैं। जिधर देखो उधर है आग छूतीं आसमाँ लपटें, चलो इस अग्निपथ पर भी टहलकर देखता हूँ मैं। बहुत है दूर मुझसे चांद पर छूने की ख़्वाहिश है, उसे छूने को बच्चों सा मचलकर देखता हूँ मैं। नहीं उलझन सुलझती है कठिन हैं प्रश्न जीवन के, पहेली से बने जीवन को हल कर देखता हूँ मैं। ग़मों के बोझ से बोझिल हुईं गमगीन पलकें जब, तेरी आँखों से बनकर अश्क ढलकर देखता हूँ मैं। न बदला है न बदलेगा 'अमर' दस्तूर दुनिया का, मगर तेरे लिये ख़ुद को बदलकर देखता हूँ मैं।

ग़ज़ल

अगर मैं तेरे शह्र आया न होता, तो दिल को भी पत्थर बनाया न होता। उजड़ती नहीं ज़िंदगी हादसों से, अगर होश अपना गँवाया न होता। सँपोले के काटे तड़पता नहीं मैं, अगर दूध उसको पिलाया न होता। बयाँ तजर्बा अपना करता मैं कैसे अगर ज़िंदगी ने सिखाया न होता। कभी कह न पाता ग़ज़ल इस तरह मैं, अगर जख़्म मैंने भी खाया न होता। अँधेरों में भी रोशनी आती छनकर, अगर चाँद ने मुँह छुपाया न होता। तेरी याद में मुस्कुराता वो कैसे, अगर तू 'अमर' उसको भाया न होता।

ग़ज़ल

ग़ज़लः क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें, है यहाँ पर कोई भी सच्चा नहीं कैसे कहें। हम ग़ज़ल हिन्दी में कहते चढ़ सके जो हर जुबां, अब दिलों में घर बने इच्छा नहीं कैसे कहें। दोस्त समझा और हमने भी भरोसा कर लिया, दोस्ती में भी मिला गच्चा नहीं कैसे कहें। तेज़ सी आवाज़ है और तल्ख़ से अल्फाज़ भी, उनको अच्छी ही मिली शिक्षा नहीं कैसे कहें। दाद दी हर शेर पर उसने हमें दिल भी दिया, वह अभी मासूम सा बच्चा नहीं कैसे कहें। क्यों गुज़ारिश पर गुज़ारिश आपसे अब भी करें, आपने जो भी दिया भिक्षा नहीं कैसे कहें। दो क़दम आगे बढ़ा पीछे हटा तू सौ क़दम, प्यार में तू है 'अमर' कच्चा नहीं कैसे कहें।

क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें

क्या है अच्छा और क्या अच्छा नहीं कैसे कहें, है यहाँ पर कोई भी सच्चा नहीं कैसे कहें। हम ग़ज़ल हिन्दी में कहते चढ़ सके जो हर जुबां, अब दिलों में घर बने इच्छा नहीं कैसे कहें। दोस्त समझा और हमने भी भरोसा कर लिया, दोस्ती में भी मिला गच्चा नहीं कैसे कहें। तेज़ सी आवाज़ है और तल्ख़ से अल्फाज़ भी, उनको अच्छी ही मिली शिक्षा नहीं कैसे कहें। दाद दी हर शेर पर उसने हमें दिल भी दिया, वह अभी मासूम सा बच्चा नहीं कैसे कहें। क्यों गुज़ारिश पर गुज़ारिश आपसे अब भी करें, आपने जो भी दिया भिक्षा नहीं कैसे कहें। दो क़दम आगे बढ़ा पीछे हटा तू सौ क़दम, प्यार में तू है 'अमर' कच्चा नहीं कैसे कहें।

कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए

कारवां लेकर चला था लोग अब थोड़े हुए, चल रहा हूँ मैं मगर हैं दोस्त मुँह मोड़े हुए। सब यही कहते मिले है रास्ता सच का कठिन, पर चला जब राह सच की दूर सब रोड़े हुए। मान लूँ कैसे कि उनको है मुहब्बत ख़ुद से भी, ख़ून से लथपथ है चहरा ख़ुद ही सर फोड़े हुए। तुम दुखी थे मैं दुखी था इसलिये थे साथ हम, दिल भरा तो साथ छूटा दुख ही था जोड़े हुए। साथ की ख़्वाहिश नहीं अब दूर मैं हूँ जा चुका, मुद्दतें बीतीं 'अमर' सब ख़्वाहिशें तोड़े हुए।

भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ

भीड़ में शामिल कभी होता नहीं हूँ,  बोझ नारों का कभी ढोता नहीं हूँ। रात को मैं दिन कहूँ सच जानकर भी, क्यों कहूँ मैं? पालतू तोता नहीं हूँ। मुल्क़ की बर्बादियों को लिख रहा जो,   मैं ही शाइर आज इकलौता नहीं हूँ। झेलता हूँ हर सितम भी इसलिए मैं, हूँ ग़ज़लगो धैर्य मैं खोता नहीं हूँ। क्यों अचानक प्यार वह दिखला रहा है?  हो न कोई हादसा, सोता नहीं हूँ। हाथ मोती लग न पाया सच तो है यह, मैं लगाता डूबकर गोता नहीं हूँ। ये कमाई उम्र भर की है कि काँटे,  मैं किसी की राह में बोता नहीं हूँ। ज़ुल्म से डर कर 'अमर' पीछे हटूँ क्यों, मौत को भी देखकर रोता नहीं हूँ।

सपना दिन में देखा, टूटा

सपना दिन में देखा, टूटा, रहबर ने ही सबको लूटा। कैसे कहें अफ़रा तफ़री में, किसने किसको कितना कूटा। अक्सर करता बात बड़ी जो,   होता है वह कद का बूटा। दुनिया दारी समझी मैंने, साथ तुम्हारा जबसे छूटा। आज 'अमर' तुम बदले से हो, पिघला पत्थर, झरना फूटा।

कुछ मस्तियाँ कुछ तल्ख़ियतयाँ जाने-ज़िगर ये इश्क़ है

ग़ज़ल: अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 कुछ मस्तियाँ कुछ तल्ख़ियाँ जाने-जिगर ये इश्क़ है, कुछ फ़ासले कुछ दर्मियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। परवाह साहिल की करें क्यों आज जब फिर लह्र से,  टकरा रहीं हैं कश्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। है आग पानी में लगी फ़ैली ख़बर जब हर तरफ़, बनने लगीं हैं सुर्खियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। नज़दीकियाँ जबसे बढीं हैं दोस्ती के नाम पर,  दिल में चलीं हैं बर्छियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। है ये जुनूँ की आग मत दो तुम हवा, इस आग में  जलकर मिटीं हैं हस्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। करने चला था फ़तह दिल शमशीर लेकर शाह जब उजड़ीं कईं थीं बस्तियाँ जाने जिगर ये इश्क़ है। मंदिर 'अमर' यह प्रेम का है भीड़ भक्तों की यहाँ, सबने लगायी अर्ज़ियाँ जाने ज़िगर ये इश्क़ है।

मौत भी हो सामने तो मुस्कुराना चाहिए

ग़ज़ल: अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 मौत भी हो सामने तो मुस्कुराना चाहिए, हाँ, नहीं क़ातिल के आगे सर झुकाना चाहिए। प्यार के बाज़ार में किस भाव से दिल बिक रहा, प्यार की क़ीमत चुकाकर आज़माना चाहिए। फूल-काँटे हर डगर तुमको मिलेंगे सच यही, चूमकर कांटों को आगे बढ़ते जाना चाहिए। सिर्फ़ बातों से नहीं है भूख मिटती पेट की, काम जो करता नहीं वापिस बुलाना चाहिए। कुछ उसे आए न आए उसने सीखा ये हुनर, महफ़िलों में आगे बढ़ चहरा दिखाना चाहिए। आजकल के दौर का कैसा चलन तू ही बता,  दोस्ती को क्या अदद सीढ़ी बनाना चाहिए। जिस दिशा जाना तुम्हें उसकी 'अमर' पहचानकर, पथ सही पहचानकर ही पग बढ़ाना चाहिए।

ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी

ख़ौफ़ के साये में लगती अब है सस्ती ज़िंदगी, मौत से पहले हजारों बार मरती ज़िंदगी। कुछ नहीं देता दिखाई सुन नहीं पाते हैं कुछ, आग में जब भूख की हर पल झुलसती ज़िंदगी। भूलकर अपनी अना सुल्तान का सज़दा करो, जी हुज़ूरी का चलन है कहती रहती ज़िंदगी। मौसमी बारिश का क्या चाहे बरसती ख़ूब हो, बाढ़ लाती है यक़ीनन सिर्फ़ बहती ज़िंदगी। मुल्क़ के इस दौर की है ये कहानी सुन ज़रा, घोषणाओं के सहारे घटती बढ़ती ज़िंदगी। टिमटिमाते से सितारे हैं बहुत इस बज़्म में, किसलिए फिर चाँद की खातिर तरसती ज़िंदगी। सीख लो दस्तूर इस बाज़ार का तुम भी 'अमर', ओढ़ लो नकली हँसी होगी विहँसती जिंदगी।

आँधियो में ज़ोर कितना (ग़ज़ल)

ग़ज़ल: अमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय मोबाइल-9871603621 आँधियों में ज़ोर कितना आज़माते हम रहे ज़िन्दगी तेरे तराने रोज़ गाते हम रहे फूल की मुस्कान कल थी आज पत्थर भाग्य में प्यार से पिघला दो पत्थर यह सिखाते हम रहे झूठ ही युगधर्म है कैसे कहो हम मान लें सांकरी सच की गली चलकर दिखाते हम रहे दिन पुराने याद करके खंडहर ग़मगीन था कैसे करता ग़म गलत उसको रुलाते हम रहे हाथ की उलझी लकीरों पर करें विश्वास क्यों जब कभी उजड़ा चमन तो गुल खिलाते हम रहे छा रहा था फिर नशा या गुफ़्तगू का था असर सुर्ख़ से गुस्ताख़ लब थे दिल लगाते हम रहे क्यों नहीं उनपर भरोसा हम 'अमर' फिर से करें मिल तसव्वुर में उन्हीं से खिलखिलाते हम रहे

शुक्रिया तेरा वतन (ग़ज़ल)

शुक्रिया तेरा वतन हम हक़ अदा करते रहे सरहदों की हो सुरक्षा इसलिये मरते रहे है पता बदलेंगी इक दिन मुल्क़ की रानाइयाँ पर भयानक देख मंज़र आज हम डरते रहे पाल रक्खा था सँपोला काट खाया जिसने है जानलेवा ज़ह्र हर-पल अश्क़ बन  झरते रहे पूछ बैठें हम न ग़ुरबत या जहालत का सबब इसलिये वो धर्म में उलझा दिया करते रहे क्या कहीं से फिर चुनावी है हवा बहने लगी? रैलियाँ इस लाॅकडाउन में भी वो करते रहे कब बहेगा धमनियों में गर्म ख़ूँ फिर से 'अमर' छोड़कर लड़ना लड़ाई आह क्यों भरते रहे

आपसे मिलने की ख़ातिर (ग़ज़ल)

आपसे मिलने की ख़ातिर आह हम भरते रहे क्या हुआ जो ख़्वाब में ही प्यार हम करते रहे क्या कहेंगे क्या सुनेंगे सोचना मुश्किल हुआ उलझनों में हम उलझकर रोज ही मरते रहे सुहबतों ने आपकी हमको  सिखाई है वफ़ा हम वफ़ा के नाम पर ख़ुद पे सितम करते रहे बादलों की ओट से चमकीं कभी जब बिजलियाँ डर पुराना याद कर अंज़ाम से डरते रहे इश्क़ में हम आपके जबसे हुए पागल हैं जी ज़ह्र का हर घूंट भी हँस कर पिया करते रहे जब ये जाना राह उनकी और मेरी  है ज़ुदा नैन से मोती निरंतर बूँद बन झरते रहे आपकी बदमाशियों ने गुदगुदाया दिल 'अमर' छुप-छुपाके प्यार यूँ ही आपसे करते रहे

अनमोल हैं आँसू न जाया करो (ग़ज़ल)

अनमोल हैं आँसू न जाया करो बेवजह भी तुम मुस्कुराया करो मुश्किल है जीना तुम्हारे बिना मेरे ख्वाबों ख्यालों में आया करो प्याले गमों के हैं छलकने लगे मत धैर्य मेरा आज़माया करो प्यासा बहुत हूँ प्यार का जाम अब हर रोज आकर तुम पिलाया करो जो रूठते हैं प्यार में बार बार पलकों पे उनको ही बिठाया करो माना कि मुश्किल है डगर प्यार की हिम्मत दिखाकर पास आया करो हर हाल देता साथ है जो 'अमर' तुम भी उसी पर दिल लुटाया करो