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'अभी-अभी' के आफिस से न्यूज एडिटर को पुलिस ने उठाया

मालिक और समूह संपादक भूमिगत : चरखी दादरी में पत्रकार उतरे सड़क पर, निकाला मौन जुलूस : प्रेस क्लब नारनौल ने की पुलिस कार्रवाई की निंदा : 'अभी-अभी' अखबार के रोहतक मुख्यालय से हरियाणा पुलिस ने न्यूज एडिटर उदयशंकर खवारे को गिरफ्तार कर लिया है। अखबार के मालिक और प्रधान संपादक कुलदीप श्योराण और ग्रुप एडिटर अजयदीप लाठर भूमिगत हो गए हैं। ये लोग अपनी अग्रिम जमानत कराने की कोशिश में हैं। सभी के मोबाइल स्विच आफ आ रहे हैं। 'अभी-अभी' से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि हरियाणा पुलिस एकेडमी के खिलाफ खबर छापे जाने से नाराज पुलिस अधिकारी अखबार की प्रिंटिंग रोकने की कोशिश कर रहे हैं। हिसार में प्रिंटिंग रोकी गई जिससे अखबार की प्रिंटिंग बाहर से कराई गई। अभी-अभी की सेकेंड लाइन को भी परेशान कर रही है पुलिस ताकि अखबार का प्रकाशन और संचालन अधिकतम बाधित की जा सके। अभी-अभी का मुख्यालय पहले गुड़गांव हुआ करता था जिसे बाद में रोहतक शिफ्ट कर दिया गया। रोहतक, हिसार और नोएडा से प्रकाशित होने वाले इस अखबार को रोहतक के मधुबन स्थित हरियाणा पुलिस अकादमी के खिलाफ खबर छापना भारी पड़ रहा है। हालांकि हरियाणा क...
कल पुनः बेचैन जी को सुनाने का मौका मिला.एक सुखद एहसा है उनको सुनना.दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मलेन की ओर से हिंदी भवन में --एक शाम कुंवर बेचैन के नाम ---कार्यक्रम में उनके एकल काव्य पाठ में हम डूबते चले गए.डॉ.व्यास ने ठीक ही कहा की पिछले पांच दशक की गुटबंदी के दौर में बिना किसी गुट का होते हुए भी खुद को साहित्य में प्रासंगिक बनाये रखना उनकी सबसे बड़ी सफलता है.परन्तु मेरी नजर में उनके काव्य संसार में अभिव्यक्त वदना और प्रेम के स्वर ने ही उनको प्रासंगिक बनाये रखा.उनके पूर्ववर्ती के रूप में पंकज के काव्य में भी जिजीविषा ,संघर्ष और प्रेम के भाव को ही प्रमुखता मिली है.पंकज और बेचैन की कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है.------

खुशबू की लकीर ही है----डॉ.कुंअर बेचैन की काव्य-यात्रा

खुशबू की लकीर ही है----डॉ.कुंअर बेचैन की काव्य-यात्रा. कल यानी १ दिसंबर ०९ को राजभाषा मंच की ओर से आयोजित साहित्य अकादमी के कर्यक्रम---कुंअर बेचैन के एकल काव्य -पाठ में शामिल होना एक सुखद -अनुभूति की तरह था.सचमुच बेहद सुरीली आवाज के मालिक कुंअर बेचैन को माँ सरस्वती ने अपनी कृपा से समृद्ध किया है.लगभग दो घंटे के इस कर्यक्रम में --------
Plz comment on my blog
पंकज जी समाज का वरदान! ये कहा जाता है कि bhagvaan कभी कभी मानव को महामानव बनाकर दुनिया में भेजते हैं।is बात को बल आचार्य ज्योतिन्द्र प्राद झा "पंकज" के जन्म पर मिलता है और ऊपर वाले की सत्ता की इन्साफ पर यकीं होता है। इस बात पर कोई किंतु परन्तु नहीं है की उपरवाले ने परमपूज्य "पंकज जी " को एक समाज का एक अनमोल वरदान स्वरुप तोहफा भएंट प्रदान किया। जारी

ye kaisi bachainee hai?

ये कैसा अनमनापन है? जोश-खरोश से  दुनिया को बदलने के सपने ३५ सालों से देख रहा हूँ.तरंग सी उठती है मन में,तूफ़ान सा उठाता है दिल में.और बढ़ जाता हूँ --कुछ कर देता हूँ.असंभव सा दीखने वाला काम मुझे ही नहीं मेरे साथियों को भी संभव दीखने लगता है.मेरे साथ सभी सपने देखने लगते हैं.पर सपने पूरे होते हैं क्या? तो फिर क्या हुआ?   

बहुत कुछ बदल गया .....पर कुछ भी तो नहीं बदला.

23 साल बीत गए. 24 साल शुरू हो गए. लगभग दो युग का अंत.  युगांत... आज ही के दिन 1986 में मैनें अपने कॉलेज में, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में व्याख्याता पद पर योगदान किया था. आज असोसिएट प्रोफेसर बन गया हूँ, परन्तु खुद को वहीं खडा पाता हूँ. बल्कि  तब बहुत अधिक जोश और उत्साह से लबरेज था मैं. जोश तो अब भी वही है, परन्तु कई बार उत्साह नही होता....परन्तु दुनिया को बदलने की तमन्ना अभी भी शेष है...वैसी की वैसी,एक दिवा स्वप्न की तरह . बहुत कुछ बदल गया .....पर  कुछ भी तो  नहीं बदला. बाल सफ़ेद हो गए . पत्नी गंभीर हो गयीं. बेटा 18 साल का हो गया. बेटी 12 साल की हो गयी..13 पूरे हो जायेंगे उसके भी जनवरी में.........

पंकज के काव्य में संघर्ष चेतना का बोध

पंकज के काव्य में संघर्ष चेतना का बोध प्रो० ताराचरण खवाड़े -------------------------------------------------------------------------------- मैं समदरशी देता जग को कर्मों का अमर व विषफल के उद्‌घोषक कवि स्व० ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी संसार से उपेक्षित क्षेत्र संताल परगना के एक ऐसे कवि है, जिनकी कविताओं में आम जन का संघर्ष अधिक मुखरित हुआ है. कवि स्नेह का दीप जलाने का आग्रही है, ताकि ’भ्रमित मनुजता पथ पा जाये’ और ’अपनी शांति सौम्य सुचिता की लौ से’ जो घृणा द्वेष के तिमिर को हर ले. यह आग्रह बहुत पहले निराला के ’वीणा वादिनी बर दे’ में व्यक्त हो चुका है – काट अंध उर के बंधन स्तर कलुष भेद, तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे इतिवृत्तात्मक द्विवेदी युगीन व यथातथ्यात्मक अभिव्यक्ति का दौर समाप्त हो चुका था. छायावाद लक्षणा-व्यंजना प्रतीक व बिंब योजना के घोड़े पर सवार हो एक नवीन भाषा में प्रकृति, सौंदर्य़, सुख-दुख का गायन व्यक्तितकता के परिवेष्टन में कल्पना का आश्रय ले स्थापित हो चुका था. परिवर्तनशीलता सृष्टि-चक्र की अनिवार्य शर्त है. छायावाद सिर्फ़ मर ही नह...

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ जी की याद में आयोजित यह कार्यक्रम हमें हिंदी साहित्य की इस शोकान्तिका पर विचार करने का मौका देता है---मस्तराम कपूर

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ जी की याद में आयोजित यह कार्यक्रम हमें हिंदी साहित्य की इस शोकान्तिका पर विचार करने का मौका देता है — कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद हमारा साहित्य कैसे विदेशी साहित्य-विमर्श पर निर्भर हो गया और उसका संबंध अपनी परंपरा से टूट गया। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास साठोत्तरी पीढ़ी से शुरू होता है और यह परिवर्तन उससे पहले के साहित्य तथा साहित्यकारों को नकार कर या उनकी तिरस्कारपूर्वक उपेक्षा कर होता है। इस परिवर्तन के अंतर्गत भक्तिकाल और रीतिकाल ही नहीं, आधुनिक काल के मैथिलीशरण, श्रीधर पाठक, पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, बच्चन, नवीन यहां तक कि जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय, रामवृक्ष बेनीपुरी, विष्णु प्रभाकर आदि भी उपेक्षित हुए। यह एक तरह का साहित्यिक तख्ता-पलट था जो राजनैतिक तख्ता-पलट का अनुगामी था। जिस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जवाहरलाल, सरदार पटेल, मौलाना आजाद आदि कांग्रेस के नेताओं ने गाँधीजी के ग्राम स्वराज और स्वतंत्रता आंदोलन के तमाम मूल्यों से पल्ला झाड़कर ब्रिटिश राज की सारी संस्थाओं और तौर-तरीको को ढोने का जिम्मा लेकर अपने को आधुनिक औ...

pankaj jee

संताल परगना की साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिभाओं को उपेक्षा के पत्थर तले दबा दिया गया नित्यानंद संताल परगना — भारत का वह भू-भाग जिसने अपनी खनिज संपदा से देश को समृद्धि दी, जिसकी दुर्गम राजमहल की पहाड़ियों ने सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने वालों को सुरक्षित शरणस्थली दिया, जिसने तब, जबकि भारत में अंग्रेजों का अत्याचार शुरू ही हुआ था, पहाड़ियां विद्रोह के रूप में सबसे पहले स्वाधीनता आंदोलन का शंखनाद किया, सामाजिक विषमताओं के विरूद्ध और शोषण-मुक्त समाज बनाने के लिये जहां के वीर सपूत सिद्धो-कान्हो ने भारत की प्रथम जन-क्रांति को जन्म दिया; जिसके अरण्य-प्रांतर में महादेव की वैद्यनाथ नगरी का परिपाक हुआ — वही संताल परगना सदियों से उपेक्षित रहा। पहले अविभाजित बिहार, बंगाल, बंग्लादेश और उड़ीसा, जो सूबे-बंगाल कहलाता था, की राजधानी बनने का गौरव जिस संताल परगना के राजमहल को था, उसी संताल परगना की धरती को अंग्रेजी शासन के दौरान बंगाल प्रांत के पदतल में पटक दिया गया। जब बिहार प्रांत बना तब भी संताल परगना की नियति जस-की-तस रही। हाल में झारखण्ड बनने के बाद भी संताल परगना की व्यथा...

pankaj jee

गीत एवं नवगीत के स्पर्श-बिन्दु के कवि ’पंकज’ डॉ० रामवरण चौधरी 16 सितम्बर 1977 की आधी रात को ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हमें छोड़ गये। मात्र 58 वर्ष की उम्र में एक सुन्दर तारा टूट गया। इसके 20 वर्ष पीछे लौट जाएं तो संभवत: 1957 या इसके भी कुछ पूर्व वे साहित्य साधना के शीर्ष पर रहे होंगे। इस अनुमान की भाषा को इसलिये बोलना पड़ रहा क्योंकि उन दिनों के कवि प्राय: आत्मविज्ञापन के प्रति सचेत नहीं रहा करते थे। परिणामत: पंकज की काव्य-यात्रा का कोई निश्चित वृत्तान्त मेरे पास नहीं है, हैं तो, बस, उनके गीत — उनकी कविताएं। पंकज जी एस. पी. कालेज दुमका में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे। इसके पूर्व वे कई स्कूल के टीचर थे, देवघर के हिन्दी विद्यापीठ में भी कई वर्षों तक अध्यापन किया था। यदि पंकज जी की आयु लम्बी होती और समय से मैं एस. पी. कालेज आया होता तो साथ कार्य करने का मीठा अनुभव मेरे साथ होता। मगर ऐसा हो नहीं सका। दुमका में उत्पल जी मेरे अभिभावक थे। जब भी मैं कोई अपना गीत उत्पल जी को सुनाता तो वे पंकज जी के गीतों की चर्चा छेड़ देते थे। हिन्दी और अंगिका के साधक साहित्यकार ...

pankaj jee

स्मृतियों के आईने में — आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ भूजेन्द्र आरत -------------------------------------------------------------------------------- 30 जनवरी, 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या बिड़ला मंदिर, नई दिल्ली के प्रार्थना सभागार से निकलते समय कर दी गई थी। इससे सम्पूर्ण देश में शोक की लहर दौ़ड़ गई। संताल परगना जिले (अब प्रमंडल) का छोटा-सा गाँव सारठ वैचारिक रुप से प्रखर गाँधीवादी तथा राष्ट्रीय घटनाओं से सीधा ताल्लुक रखने वाला गाँव के रूप में चर्चित था। इस घटना का सीधा प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ा। सारठ क्षेत्र के ग्रामीण शोकाकुल हो उठे। 31 जनवरी, 1948 को राय बहादुर जगदीश प्रसाद सिंह विद्यालय, बमनगावाँ के प्रांगण से छात्रों, शिक्षकों, इस क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ हजारों ग्रामीणों ने गमगीन माहौल में बापू की शवयात्रा निकाली थी, जो अजय नदी के तट तक पहुंचीं। अजय नदी के पूर्वी तट पर बसे सारठ गाँव के अनगिनत लोग श्मसान में एकत्रित होकर बापू की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे। मैं उस समय करीब 8-9 वर्ष का बालक था, हजारों की...

मेरी ताज़ी झारखण्ड यात्रा

I AM REALLY PROUD OF MY PROFESSION WHICH HAS BEEN GIVING ME ENORMOUS OPPORTUNITIES TO SERVE THE HUMANITY.WAY BACK IN 1986,WHEN I HAD BECOME A LECTURER I WAS SO HAPPY THAT I STARTED FEELING AT THE TOP OF THE WORLD.MY FRIENDS WHO WERE PREPARING FOR CIVIL SERVICES WERE NOT ABLE TO COMPREHEND WHEN THEY FOUND THAT I WAS CONSIDERING TEACHING IN A COLLEGE OF DELHI UNIVERSITY MUCH MORE WORTH THAN ANY THING ELSE.MAY BE I WAS FASCINATED TO THIS PROFESSION BECAUSE I HAD SEEN THE PRESTIGE AND SHRADDHA ENJOYED BY MY FATHER , A GREAT TEACHER TOO ,SINCE MY CHILDHOOD. TODAY AFTER BECOMING AN ASSOCIATE PROFESSOR AND ASPIRING TO BECOME A PROFESSOR (IF THE PROFESSORSHIP IS INTRODUCED IN THE COLLEGES OF DELHI UNIVERSITY) I FEEL MUCH MORE PROUD AND CONTENTED SINCE THIS PROFESSION HAS BEEN GIVING ME CREATIVE SATISFACTION IN THE REAL SENSE . BUT MORE THAN A TEACHER I STILL FEEL LIKE A STUDENT , AS FROM THE VERY BEGINNING OF MY STUDENT DAYS ,I HAVE BEEN CURIOUS TO KNOW MORE ABOUT THE PLACES I VISIT.MAY BE...

www.pankajgoshthi.org/ launched and started---a web-site dedicated to santal-pragnas of jharkhand.

३० जून २००९ को दुमका में हुए दो समारोह काफी चर्चित रहे.पहला समारोह या कहें समारोहों की श्रृंखला तो प्रत्येक वर्ष हल-क्रांति दिवस के रूप में आयोजित की जाती है,परन्तु दूसरा समारोह इस मायने में महत्त्वपूर्ण रहा कि यह आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा 'पंकज' की ९०वी जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था.आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा 'पंकज' ९०वी जयंती समारोह समिति तथा पंकज-गोष्ठी परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह समारोह काफी चर्चित रहा तथा मिडिया ने भी इसे काफी प्रमुखता दी.३० जून के प्रभात-खबर ने "आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा 'पंकज' की ९०वी जयंती आज " शीर्षक से बड़ा समाचार तो छापा ही,अलग से एक बड़ा लेख भी प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था "स्वयं में एक संस्थागत स्वरुप थे कविवर पंकज जी".लेखक ने इस लेख में पंकज जी के कई पहलुओं को उद्घाटित करते हुए समारोह की सफलता की नींव दाल दी. समारोह की शुरुवात होने में एक घोषित समय से एक घंटे का विलंब हुआ क्योंकि २८-२९जुने को मुसलाधार वारिस तो हुई ही थी,३० की सुबह से ही घनघोर वर्षा हो रही थी.मनो भय...

हाँ ये वो मंजर तो नहीं...२....( धारावाहिक ).

हां तो में कह रहा था कि बहुत पहले ही गोसाई जी कह गए है --पर उपदेश कुशल बहु तेरे --सो भाई जब तक अपनी नौकरी , चाहे टी वी की नौकरी हो , चाहे अखबार की नौकरी या फ़िर चाहे विश्वविद्यालय की ही नौकरी क्यों न हो , सब के सब अपनी चमड़ी बचाकर बोलेंगे और लिखेंगे भी.व्यवस्था के खिलाफ खूब लिखेंगे और खूब बोलेंगे.बेचारी व्यवस्था तो किसी का कुछ कर नही सकती अब , क्योंकि उसने तो तुम्हें एंकर , पत्रकार , लेखक , प्रोफ़ेसर और न जाने क्या-क्या पहले ही बना रखा है। सो तुम कलन तोड़ते जाओ ,पन्ने भरते जाओ ,स्टूडेंट्स को भासन पिलाते जाओ , समाचार चेनलो पर मशीन की तरह बजाते जाओ ,व्यवस्था तुम्हारा कुछ आमदानी ही करेगी,कुछ जेब गरम ही होगी.और लगे हाथ तुम महान भी बन जाओगे-महान पत्रकार ,महान लेखक ,महान आचार्य आदि-इत्यादि। सो भाई हम सब क्या कर रहे है ,बखूबी जानते हैं। हम यह भी जानते है कि नेता लोग जो नही कहते है और करते रहते है उससे भी नेता लोगो की धाक बढाती ही है। पैसे से सबकुछ ख़रीदा जाता है हमारे लोकतंत्र , महान लोकतंत्र में। बुद्धिजीवी तो सब दिन से नेताओं की दरबारी करते रहे , बिकते रहे और लिखते रहे। राजा-महाराजाओं के पास भ...

हाँ ये वो मंजर तो नहीं.....( धारावाहिक )

हाँ यह मंजर पहले कभी नही देखा.... " मुझे याद नही आता कि पिछले किसी चुनाव में लोगो की इतनी दिलचस्पी रही हो " ये शब्द हैं खुशवंत सिंह जी के , आज के हिंदुस्तान समाचार पत्र में ,आज के हिन्दुस्तान की चुनावी गहमागहमी पर। सहसा ऐसा लगा जैसे किसी ने पुरानी तस्वीर रखी हो सबके इसी ,नई परिस्थिति को समझने के लिए । इसी के बरख्श इ बी एन ७ के प्रबंध सम्पादक आशुतोष के आज के लेख की पंक्तियों को रखता हूँ "ये कहा जब सकता है कि देश कि राजनीति की दिशा बदल रही है , वोटर समझदार हो रहा है ,एक नई सिविल सोसाइटी खड़ी हो रही जो नेताओं की जबाबदारी को तय करने के लिए तैयार है..." यानी अब चुनावी मंजर बदलने लगा है ।जी हाँ इसमे कुछ तो सचाई है ही ।मुझे १९७४ के पहले के दौर की बातो की स्मृति नही है ,१९७१ के भारत-पाक युद्ध के समय गाँव के चौराहे पर सर्द शाम में धंधा तापते (अलाव सेंकते )हुए कुछ बुजुर्ग चेहरों की हलकी -धुंधली छाया दिखाती है ,जो भारतीय सैनिकों पर गर्व कर रहे थे .फिर १९७४ के दौर के जे पी आन्दोलन की याद आती है की किस तरह उस समय के सभी नौजवान ,इंकलाबी हो गए थे.मेरे बड़े भाई ने तथा मेरे छोटे बहनो...

सोचना तो होगा ही.करना भी होगा.

बहुत दिनों के बाद likh रहा हूँ , क्योंकि अभी कंप्यूटर की भाषा में दक्षता न रहने के कारण तीन-चार दिनों से कुछ लिख ही नही पा रहा था.खैर........... इन दिनों धटनाएं तेजी से घाट रही हैं.आज कई राज्यों मैं चुनाव हुए.रात के समाचार से पता चलेगा की कहाँ क्या हुआ?हाँ आज के अखबार में दक्षिण अफ्रीका के चुनाव की बात कही गई है और बताया गया है की भारत के विपरीत वहां मतदान की प्रक्रिया एकदम शांत होती है तथा एक रूटीन की तरह इसे भी समझा जाता है.वहां के पूर्व राष्ट्रपति डॉ नेल्सन द्वारा वोट डालने की फोटो भी छपी है.तो फिर हमारे देश का यह मंजर क्यों?इसका विश्लेषण हम सबको अपने-अपने ढंग से करना ही चाहिए.आज की घटनाओं पर तो प्रतिक्रिया बाद में ही पोस्ट कर पाऊंगा ,परन्तु ,हॉटसिटी डॉट कॉम पर एक पाठक(झा जी) की प्रतिक्रिया से जोड़कर आज पुनः उसी सवाल को रखना चाहूँगा.रवि वार की रात शिप्रा-रिविएरा में एक घटना घटी.किसी का नाम नही लूँगा .एक पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा लगे गए झंडे को उतरकर दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी पार्टी का झंडा लगा दिया गया.दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता इस आर डब्लू ऐ के अध्यक्ष भी हैं.इस ...

कब तक चुपचाप बैठे रहोगे?

आख़िर कब तक तुम सहोगे?चुनाव--२००९ के प्रथम चरण में १९ लोग मारे गए,जैसा की अखबार बताते हैं.जब पूरी चुनावी प्रक्रिया समाप्त हो जायेगी तब क्या होगा?इतना बड़ा देश---ये तो छोटी -मोटी बातें होती रहती हैं, यही कहेंगे न आप लोग!जब चुनाव नहीं होता है , तब भी तो रोज-रोज लोग मरते हैं.फिर अभी लोग मरते हैं तो क्यों स्यापा कर रहा हूँ मैं.ठीक कहा आपने.पर क्या करुँ.मैं चुप तो रहना जानता नहीं हूँ.भो सकता हूँ,चीख सकता हूँ ,दहाड़ भी सकता हूँ,और स्यापा भी कर सकता हूँ की लोग कम से कम सुने तो.जानता हूँ ,आप भी विवश हैं--आख़िर सब तो एक जैसे ही हैं.शकल अलग -अलग है,झंडा अलग-अलग है , लेकिन लोग तो वही हैं न.हर पार्टी के मठाधीश टिकट बनते समय देखते हैं की कौन बाहुबली है , कौन धनबली है तथा कौन कितना बड़ा धंधेबाज है.तो हम आम लोग कर ही क्या सकते हैं?लेकिन अगर यही बात गाँधी जी ने भी सोची होती तो?भगत सिंह क्यों फाँसी के फंदे पर हँसते-हँसते झूल गए?सुभाष ने क्यों दी कुर्बानी? इतिहास को जानने वाले जानते हैं की हर दौर में ऐसा होता है की समाज की आसुरी शक्ति एक-दूसरे से लड़ती भी है,पर रक दूसरे को बचाती भी है.सारी व्यवस्था पर...

विष्णु प्रभाकर जी सादगी की प्रतिमूर्ति थे..

१९९० का वर्ष मेरे लिए ,अब ऐसा लगता है ,काफ़ी महत्वूर्ण था.उस समय मुझमे सकारातमक उर्जा का प्रबल आवेग हिलोरें ले रहा था.मैंने जो कुछ भी समाज को दिया,या सामजिक ऋण से उरिण होने के लिए जिन कार्यों को सम्पन्न किया,उनमे बहुतो की शुरुआत ९० से ही हुई है.ठीक से याद नही आ रहा है की मैं कैसे और किनके साथ सबसे पहले मोहन पैलेस की छत पर चलने वाले काफी हाउस में पहुँचा.शायद प्रो. राजकुमार जैन जी के साथ गया था.वह शनिवार का दिन था.वहीं पर दिल्ली के चर्चित लेखकों और कलाकारों की मंडली लगी हुई थी.उस मंडली के मध्य वयोवृद्ध खादी धरी,गाँधी टोपी पहने विष्णु प्रभाकर जी सुशोभित हो रहे थे.उस समां ने मुझ पर गजब का असर ढाया.फ़िर तो मैं हर शनिवार को उस शनिवारी गोष्ठी मैं बैठने लगा.यह सिलसिला १९९५ तक चला,जबतक विश्वविद्यालय परिसर का रीड्स लाइन हमारा निवास रहा.इन पांच वर्षों में न जाने कितने नामी -गिरामी लेखकों ,कवियों,कलाकारों और पत्रकारों का साहचर्य रहा.पता नहीं कितनी साहित्यिक गोष्ठियों में समीक्षक या वक्ता की हैसियत से शामिल हुआ.उन दिनों मैं दाढी रखता था तथा पाईप पीता था.उन दिनों के उप-कुलपति प्रो.उपेन्द्र बक्षी साहब...

झकास

हाँ मुझे अपने ब्लॉग का अब सही नाम मिल गया है.अलग-अलग ब्लॉग को पढ़कर मैं सोच रहा था की मैं भी अपने ब्लॉग का कुछ ऐसा नाम रखूँ की बस---सब बोलने लगे की वाह क्या नाम है?अभी सोच ही रहा था की मेरी १२ साल की बेटी आकर खड़ी हो गयी मेरे पास और कुछ-कुछ बोलने लगी.मेने कहा जाओ ,मुझे सोचने दो ब्लॉग का नया नाम,तभी वह बोल उठी--झकास.बस मुझे नाम मिल गया--झकास.सचमुच हमेसा तरो-तजा रहने वाला मैं,मेरी योजना,मेरी कल्पना और मेरा स्वप्निल संसार --झकास ही तो है.चकाचक और तरोताजा.सो अब झकास को देखिये,झकास को पढिये,झकास पर कमेन्ट करिए.आप और हम मिलकर झकास ही करेंगे.अरे हाँ.किसी भाई या बहन ने झकास नाम से पेटेंट तो नही करा लिया है--अगर ऐसा है तो बता देना यार.तब फिर बदल लूँगा ब्लॉग का नाम.तब तक झकास ही चलेगा.नहीं यार दौडेगा.आप सब भी दौडो न मेरे साथ.

माहौल गरम है.

देश में चुनावी आंधी चल रही हो,नेता से लेकर जनता तक -सब पर बैसाख में भी होली की खुमार हो,सभी कलम तोड़ लेखक अखबारों के पन्ने काले कर रहे हों,टी वी पर बुद्धिजीवी बनकर देश और समाज के स्वयम्भू ठेकेदार अपनी डफली -अपना राग का भोंपू बजा रहे हों, तो यह मुमकिन ही नही की आर डबल्यू ए को राजनीती के सफर की पहली सीढी बनने वाले छुटभइए और छुट्बहने तिरछी चल न चले.सभी जानते हैं की इंदिरापुरम में-- गाजियाबाद ही नही पूरे एन सी आर में एक नयी हलचल ,बहुत कम ही समय में, पैदा करके ,इंदिरापुरम जो कभी समस्यापुरम था को अब सुन्दरपुरम बनने में फेडरेशन ऑफ़ इंदिरापुरम आर डबल्यू ए को बड़ी सफलता मिली है.इस नए संगठन को खड़ा करने में इसके सभी शुरूआती सदस्यों का योगदान काफ़ी बड़ा रहा है.सच तो यह है की इस नयी ताकत को कुचलने का प्रयास यहाँ की सभी निहित स्वार्थी ताकतों ने किया था.लेकिन तब हमें कोई तोड़ नही पाया क्योंकि हम सब एक थे.मैं लगातार सबके संपर्क में रहता था और सभी मेरे मुरीद बन गए थे.लेकिन मेरे विरोधियों को हमारी टीम की यह एकता फूटी आँख भी नहीं सुहाती थी,इसीलिए उन्होंने अलग चाल चली--हमारे साथियों को अकेले-अकेले तोड़ने क...

झारखण्ड की राजनीती का खेल

यूँ तो पूरे देश की राजनीती एक खेल की तरह होती जा रही है,परन्तु झारखण्ड का खेल तमासा banta जा रहा है. इस बार के खेल में सभी नेताओ और छुट्भईयों का बेशर्म चेहरा साफ-साफ दिखने लगा है.सिद्धांत और आदर्श का कोई नाम भी नहीं ले रहा है. दिखाने के लिए ही सही राजनीति धर्म का कुछ तो पालन होना चाहिए था.झारखण्ड के संताल परगना की राजनीती तो एकदम गरम हो गयी है.संताल परगना, जो मेरे पूर्वजों की जन्मभूमि- कर्मभूमि के साथ मेरे राजनीतिक कर्म का भी क्षेत्र है, को इस हालत में देखकर दिल दुखता है.संताल परगना के duhakh-दर्द को कोई भी तो नहीं समझ रहा है.बिहार से मुक्तहोकर बनने वाले झारखण्ड में भी यह इलाका उपेक्षित ही रह गया.कहने को तो झारखण्ड के सबसे बड़े नेतागण इसे ही अपनी राजनीति का प्रयोग स्थल बनाते हैं, पर महज इसकी भावनाओं का दोहन करने के लिए ही.इस बार के इस चुनावी तमासे में इसीलिए तमासाबीनों को ही इसका फल भुगतना होगा.किसी न किसी को तो जीतना है ही,पर आख़िर-आख़िर तक कोई भी आश्वस्त नहीं हो सकेगा इस बार. और यह चुनाव संताल परगना के साथ खिलवाड़ का शायद आखिरी चुनाव होगा,क्योंकि अब यहाँ की जनता सोचने लगी है की झार...

मैं सोचता और करता रहूँगा

लगता है आप सबने सोचना छोड़ दिया है.चिंता की कोई बात नहीं.मैं हूँ न.मैं सोचूंगा भी और करूंगा भी.फिर आप सब को प्रसाद ग्रहण करने बुला लूँगा.तब तक आराम काटिए आप,क्योंकि कान फोडू भोंपू की आवाज सुनते-सुनते आप भी उकता गए होंगे.

तो क्या सोचा आपने ?

वाह भाई वाह. ये क्या सुन रहा हूँ ? देश के कोने-कोने से क्या समाचार आ रहे हैं?अभी भी वक्त है ,सुन लीजिये हमारी बात.मान लीजिये हमारी मंत्रणा.तो क्या सोचा आपने?

चुनाव और हम.

न जाने इस चुनावी मौसम में कौन क्या-क्या लिख रहा है.नामी- गिरामी लेखकों से लेकर स्वयम्भू चिन्तक--मेरी तरह,सभी कुछ न कुछ लिख रहा है ,इसकी परवाह किए बिना की कोई पढ़ भी रहा की नही?ना, ना आतंकित मत होइए ,नामी-गिरामी लेखक भी बस नाम की ही कमाई खा रहे हैं.वे भी क्या लिखते हैं उनसे उनका कोई सरोकार है या नहीं ये तो वही जाने पर पढ़ने वल्लों का शायद ही कोई सरोकार हो ऐसे लेखकों से ऐसा मैं जरूर कह सकता हूँ.सो भाई यहाँ पाठकों की नहीं लेखकों की रेलमपेल है.अगर आप लेखक हैं तो माफ़ करना मैं अपना और समय बर्बाद क्यों करूं?आपको तो पढ़ना है नहीं.अगर आप पाठक हैं तो आपका भाव बढ़ा होगा.आप मेरा लिखा क्यों पढेंगे,आपको तो मैं टिकेट देकर चुनाव जितवा सकता नही?तो मैंने सोचा क्यों न सारे रोल खुद ही कर लूँ?टिकट लेकर चुनाव लड़ लूँ,लेखक बनकर पन्ने भर लूँ,और पाठक बनकर अपना लिखा ख़ुद ही पढ़ लूँ.सो वही कर रहा हूँ यार .तुम सब भी तो वही कर रहे हो--कोई किसी के लिखे पर कमेन्ट नहीं कर रहा है,बस अपना -अपना देख रहा है.चुनाव में भी तो यही होता है.नेतागण अपना-अपना देखते हैं,चमचे-बेलचे अपना-अपना देखते हैं.जय हो इस लोकतंत्र की जय हो.इतन...

कविता कोष सचमुच औरों से हटकर है.

कविता-कोष को कल जो पत्र भेजा था उसका त्वरित उत्तर प्राप्त हुआ.संपादक अनिल जनविजय जी ने मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया,अतः मैं उनका कृतज्ञ हूँ.कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए मेरे द्वारा भेजे गए दूसरे पत्र का भी उन्होंने तुरत उत्तर दिया तथा पंकज जी से सम्बंधित सारी सामग्री मांगी.पद्य,गद्य,संस्मरण,समीक्षा,तथा पंकज जी पर लिखे गए लेखों को भी उन्होंने माँगा है.अब मैं जल्दी से जल्दी अनिल जन विजय जी को सम्बंधित सारी सामग्री यूनिकोड पर भेज दूंगा.आप सब से भी अपील करता हूँ की अगर किसी पाठक के पास पंकज जी की कोई रचना उपलब्ध हो या पंकज जी के ऊपर किसी अन्य लेखक के द्वारा लिखित कोई सामग्री उपलब्ध हो तो मुझे या कविता कोष को प्रेषित कर दें.मेरे इस ब्लॉग में कमेन्ट करते हुए भी इस तथ्य का जिक्र सुधि पाठक या लेखक गण कर सकते हैं.आइए,हम सब मिलकर पंकज जी के ऋण से उ ऋण होने हेतु इस महायज्ञ में अपना-अपना योगदान दें.संताल परगना के इस mahan vibhooti के प्रति हमारी यही sachhi shraddhanjali होगी .